नाथ मोहि ऐसी शक्ति हो।
ध्याऊँ शुद्ध स्वरूप अपना, चित्त न विचलित हो।। टेक ।।
भावे शान्त दशा तुम स्वामी, और न कछु सुहाय।
रहूँ मग्न अपने स्वरूप में, यही भाव उमगाय।। 1।।
पापोदय में नहीं घबराऊँ, पुण्योदय नहीं चाहूँ।
पाप-पुण्य भावों से न्यारा, चित्स्वरूप नित भाऊँ।। 2।।
नहीं अभिलाषा ख्याति लाभ की, रहूँ सहज निर्ग्रन्थ।
हो निःशंक एकाकी निस्पृह, चलूँ मुक्ति के पन्थ।। 3।।
सहज स्व-संवेदन आनंदमय, वर्ते काल अनंत ।
तुष्ट स्वयं में तृप्त स्वयं में, स्वयं सदा विलसंत।। 4।।
तुमसे स्वामी पाये उर में, आनंद अपरम्पार ।
द्रव्य नमन हो, भाव नमन हो, सहज नमन अविकार ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४१ से ४२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’