नाथ मोहि तारत क्यों ना? क्या तकसीर हमारी?
नाथ मोहि तारत क्यों ना? क्या तकसीर हमारी? ।।टेक।।
अंजन चोर महा अघकरता, सप्तविसनका धारी ।
वो ही मर सुरलोक गयो है, बाकी कछु न विचारी ।।१।।नाथ. ।।
शूकर सिंह नकुल बानरसे, कौन कौन व्रतधारी?
तिनकी करनी कछु न विचारी, वे भी भये सुर भारी ।।२।।नाथ. ।।
अष्टकर्म वैरी पूरबके, इन मो करी खुवारी ।
दर्शनज्ञानरतन हर लीने, दीने महादुख भारी ।।३।।नाथ. ।।
अवगुण माफ करे प्रभु सबके, सबकी सुध न विसारी ।
‘दौलत’ दास खड़ा करजोरे, तुम दाता मैं भिखारी ।।४।।नाथ. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ३८
अर्थ
अर्थ-हे स्वामी। आप इस सप्तार-सागर से मुझे क्यो नहीं पार करते हैं। मेरा क्या दोप है? हे स्वामी अंजन चोर वड़े-बड़े पाप करता था और सप्त व्यसनों का धारक था, किन्तु वह भी यहाँ में मग्कर देवलोक में गया है। आपने उसके पापों पर कोई ध्यान दिया। इसी प्रकार शुकर, सिर, नकुल और वानर ने भी कोई व्रतादि नही धारण कर रखे थे, परन्तु दे भी स्वर्ग में महादेव हुए है। आपने उनके कर्मों की ओर भी कोई ध्यान नही दिया। हे स्वामी ये अष्टकर्म मेरे पूर्व जन्म के शत्र हैं। उन्होंने मेरी दुर्दशा कर रखी है, मेरे दर्शन-ज्ञान-यारिप्ररुपी रानों को मुझसे छीन लिया है और मुझे अपार दुख दे रखा है। कविवर वीनलराम करते है कि हे ग्वामी आपने सबके अवगुणी की क्षमा किया है और सभी को भली प्रकार संभाला है। जब आपका दास में भी आपके समक्ष व्यथ जारकर खड़ा है। मंग भी उद्धार कीजिए। हे स्वामी आप बड़े दाता है ओर में भिखारी है। विशेष-कपट दीवत-किनास की अधिकाश प्रतियों में नाहीं पया जाता और इसकी पर्वत भी अन्य परों से कुछ भिन्न प्रतीत होती है, अतः यह प्रलिप्त हो सकता है।
स्रोत: दौलत विलास, पद 51।
मूल पृष्ठ (छवि):
प्रूफरीडिंग बाकी है