नमो नमो जिनवाणी माता, शाश्वत् मंगलकारी | namo namo jinavani mata shashvat mamgalakari

नमो नमो जिनवाणी माता, शाश्वत् मंगलकारी।

नमो नमो जिनवाणी माता, मोह तिमिर हरतारी।। टेक।।

नव तत्त्वों में छिपी हुई, चैतन्य ज्योति अविकारी।
नित्य व्यक्त आनन्दरूप,
चिद्रूप
दिखावनहारी।। 1।।

बंध विदारन प्रज्ञा छैनी, मात बतावनहारी ।
धर्म कल्पतरु उपवन धरनी, शम सुख सुमन सु वारी ।। 2 ।।

विषय चाह दवदाह बुझावन, साम्य सुधा विस्तारी ।
पीवत स्वस्थ भये भवि प्राणी, जन्म जरा मृत टारी।। 3।।

अनेकान्तमय वस्तु कथन को, स्याद्वाद सुखकारी।
नय-प्रमाण युक्ति से माता, तत्त्व कहे अविकारी।। 4।।

रत्नत्रयमय धर्म बताया, सबही को हितकारी।
परम अहिंसा रूप जगत् में, राग-द्वेष निरवारी।। 5।।

द्वादशांगमय श्री जिनवाणी, चार अनुयोग सुखकारी।
मर्म पिछाने भेद-विज्ञानी, आतम अनुभव धारी।। 6।।

कहे द्रव्य छह, सात तत्त्व, द्रव्यानुयोग सुखकारी।
आश्रय करने योग्य एक, ध्रुव शुद्धातम अविकारी।। 7।।

ज्ञेय मात्र जानो अजीव, आश्रव-बंध है दुःखकारी।
संवर-निर्जरा-मोक्ष प्रगट योग्य कहे सुखकारी।। 8।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४८ से १४९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’