नहिं गोरो नहिं कारो चेतन, अपनो रूप निहारो | Nahim Goro Nahim Karo Cetan Apano Rup Niharo

नहिं गोरो नहिं कारो चेतन, अपनो रूप निहारो।

दर्शन ज्ञान मई चिन्मूरत, सकल करम तें न्यारो ।। टेक ।।

जाके बिन पहिचान जगत् में, सहयो महा दुख भारो।
जाके लखे उदय हो तत्क्षण, केवलज्ञान उजारो ।। 1 ।।

कर्मजनित पर्याय पायके, कीनों तहां पसारो।
आपा-पर को रूप न जान्यो, तातैं भव उरझारो ।।2।।

अब निज में निज कूं अवलोकूं, जो हो भव सुलझारो।
‘जगतराम’ सब विधि सुखसागर, पद पाऊँ अविकारो ।। 3 ।।


स्रोत: भक्ति-भावना (प्रथम खण्ड)
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १९६