नग्न दिगम्बर वनवासी को,
देखन मम अखियाँ प्यासी।
नाटक सा जग का रूप देख,
जग से भये उदासी।
भावत ध्यावत निज रूप अहो,
विचरे आतम उल्लासी।।1।।
नग्न दिगम्बर वनवासी को
देखन मम अखियाँ प्यासी।
तीर्थंकर चक्री कामदेव,
पदवी भी तनिक न रासी।
तज एक पंथ निर्ग्रन्थ चले,
बड़भागी शिवमग वासी।।2।।
नग्न दिगम्बर वनवासी को
देखन मम अखियाँ प्यासी।
सब सहें परिषह ज्ञाता रह,
कणिका न खेद की भासी।
रहते वन में रमते निज में,
स्वाश्रित आनंद पिपासी।।3।।
नग्न दिगम्बर वनवासी को
देखन मम अखियाँ प्यासी।
थिर अन्तरमुहुरत लीन भये,
कर्मन सेना सब नासी।
अब राग द्वेष मल द्वन्द नहीं,
तीनो जगती परकासी।।4।।
नग्न दिगम्बर वनवासी को
देखन मम अखियाँ प्यासी।
कब नयन हमारे सफल होंय,
तुम दर्शन को अभिलाषी।
तुम सम परिणती हो कब मेरी,
ज्ञाता शिवपुर प्रत्याशी।।5।।
नग्न दिगम्बर वनवासी को
देखन मम अखियाँ प्यासी।

ज्ञाता सिंघई
(सिवनी)