ना जाने कितना सुख प्रभु को, नयन पलक नहिं मारें।
निर्निमेष नासाग्र दृष्टि धर, आपहि आप निहारें ।। टेक ।।
स्वयं-स्वयं में तृप्त रहें नित, शांत दशा प्रभु कहती,
दर्शन करते भव्यजनों के, ज्ञान ज्योति उर जगती।
धन्य दशा है आत्म ध्यान की, सर्व विभाव निवारें ।। 1 ।।
निर्विकार श्रृंगार बिना, तन नग्न दिगम्बर सोहे,
अस्त्र-शस्त्र की नहीं जरूरत प्रभु को, बैरी को है।
अहो ! जितेन्द्रिय परम अतीन्द्रिय, आतम रूप संभारे ।। 2 ।।
दर्शन ज्ञान अनन्त है जिनका, है सुख वीर्य अनन्त,
शक्ति अनन्त सु व्यक्त हुई है, प्रभुता को नहीं अन्त।
ज्ञानानन्दमय, परमानन्दमय, शुद्धातम रूप निहारें।। 3।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’