मुनिवर का जीवन आनंदमय, है आनंदमय, परमानंदमय ॥ टेक ॥
तृप्त स्वयं रागादि न उपजें, जीवन सहज है समतामय।
परम शांत निर्ग्रन्थ रूप है, सर्व लोक को मंगलमय ॥ 1॥
परिणति सहज अनन्यगत वर्ते, सर्व दुःखों का होता क्षय।
परम जितेन्द्रिय मग्न स्वयं में, होवें सहज परीषहजय ॥ 2॥
उपसर्गों में भी वे मुनिवर, निरुपसर्ग रह लहें विजय।
सहजपने दर्शावें हमको, चित्स्वरूप अपना सुखमय ॥ ३॥
भाव नमन हो उन संतों को ध्यावें चित्स्वरूप अक्षय ।
चित्स्वरूप ध्याते-ध्याते, मम सर्व कर्म हो जाय विलय ॥4॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८६ से १८७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’