मुनिवर कब दर्शन पाऊँ, गुरुवर कब दर्शन पाऊँ | Munivar Kab Darsan Pau Guruvar Kab Darsan Pau

मुनिवर कब दर्शन पाऊँ, गुरुवर कब दर्शन पाऊँ।।टेक ।।

साक्षात् जिनरूप निहारूँ, चरणन बलि बलि जाऊँ।
तुम साक्षी में दीक्षा धारूँ, निर्ग्रन्थ पद प्रगटाऊँ ।। 1 ।।

लौकिक संग न मोहि सुहावे, पद असंग नित भाऊँ।
अन्तर्द्वन्द क्लेशमय भासे, नित निर्द्वन्द रहाऊँ ।। 2 ।।

परमानंदमय ध्येय आपका, अन्तर्मुख हो ध्याऊँ ।
आधि-व्याधि-उपाधि न उपजे, परम समाधि पाऊँ।।3।।

तुम प्रसाद से अहो ऋषीश्वर, भव बन्धन विनशाऊँ।
परम दशा विलसे अविकारी, जीवन सफल बनाऊँ।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२२