मुनीश्वर मग्न रहे निज माँहि ।।टेक ।।
सहज स्वभावहि से आनंदित, तृप्त रहें निजमाँहि ।
सतत अनुभवें इक शुद्धातम, अन्य कुछ चिन्ता नाहिं ।।1।।
देव पशु जड़ जन के द्वारा, कृत उपसर्गों माँहि ।
साम्य भाव धरि सावधान रहें, निज आराधन माँहि ।। 2 ।।
घोर परीषह उपसर्गों में, रंच आकुलित नाहिं ।
सहज निराकुल ज्ञाता रहते, वे कर्मोदय माँहि ।।3।।
नहीं असाता में विषाद कछु, हर्ष न साता माँहि ।
उदासीन निस्पृही धन्य मुनि, लगन लगी निज माँहि ।।4।।
मुनि की परिणति मुनि जैसी ही, दिखे ओर में नाहिं।
तिनको रूप विचार किये तैं, पातक सर्व नशाहिं ।।5।।
हे गुरुवर तुम सम निर्ग्रन्थ हो, हम भी वन को जाँहिं।
एकाकी निस्पृह आनन्दमय, निज में तृप्त रहाहिं ।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३१