मुनिराज बनेंगे, अहो ! जिनराज बनेंगे | muniraja banemge aho jinaraja banemge

मुनिराज बनेंगे, अहो ! जिनराज बनेंगे ।

ज्ञायक स्वरूप है, सहज ज्ञायक ही रहेंगे।। टेक।।

परिग्रह प्रपंच में नहीं कुछ सार दिखाया,
मोह मायामय जग जाल से अब चित्त घबराया।
निर्ग्रन्थ रूप है अहो ! निर्ग्रन्थ रहेंगे।। 1 ।।

है देह, देह में अरे ! हम देह से न्यारे,
हम ज्ञानमय हैं, ज्ञानमय ही भाव हमारे।
निर्मम हो देह से अहो ! विदेह रहेंगे ।। 2।।

नहीं अप्रमत्त नहीं प्रमत्त, ज्ञायक मात्र हम,
पर भावों से अति भिन्न, सहज ज्ञान मात्र हम।
हो पर से भिन्न उपासित, सदा शुद्ध रहेंगे।। 3।।

निज में ही मग्न हम रहें, आश्रव न हों स्वयं,
चाहे जैसे हों पूर्व बन्ध, झड़ जावें स्वयं ।
निष्काम अरु निष्कर्म, निज में तृप्त रहेंगे।। 4।।

जग से अपेक्षा कुछ नहीं, निरपेक्ष प्रभुतामय,
प्रभु रूप जाना अपना, हम हो गये निर्भय ।
ज्ञेयों प्रति निरपेक्ष, जाननहार रहेंगे।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३७ से २३८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’