मुनि दर्शन को चित हुलसाय, धन्य भाग्य प्रत्यक्ष लखाय | Muni Darsan Ko Cit Hulasay Dhany Bhagy Pratyaks Lakhay

तर्ज : रोम-रोम पुलकित हो जाय…

मुनि दर्शन को चित हुलसाय, धन्य भाग्य प्रत्यक्ष लखाय।

स्वाभाविक जिनरूप सुहाय, सहज शीश चरणन झुक जाय ।।टेक।।

विषयाशा आरम्भ न लेश, तीन चौकड़ी हुई निःशेष।
प्रचुर स्वसंवेदन अभिराम, साधें निजपद आठों याम ।।1।।

जग से परम उदास रहाय, वन खण्डादिक वास कराय।
पीछी शास्त्र कमण्डल सोय, और परिग्रह नाहीं कोय।।2।।

सिंहवृत्ति पर नाहीं क्रूर, इन्द्रिय मद मेटन को शूर।
अभयरूप मुद्रा सुखदाय, ज्ञान ध्यान तपलीन रहाय ।।3।।

मुनिवर की है क्षमा अनूप, सबको लखे शुद्ध चिद्रूप।
रत्नत्रय साधक निर्ग्रन्थ, सहज सुझावें भव का अन्त ।।4।।

उपसर्गों में नहीं चिगाँय, निश्चल निज में मग्न रहाँय।
ख्याति लाभ की नहीं अभिलाष, अन्तर गुप्त सु अनियतवास ।।5 ।।

करें न मिथ्या मंत्र अरु तंत्र, जिनका नाम स्वयं ही मंत्र।
आत्म शान्ति संदेश सुनाय, देखत वंदत दुःख पलाय ।।6।।

सहज सु धर्मामृत वरषाय, सम्यक् तत्त्व स्वरूप दिखाय।
भव्यों का करते उपकार, आप तिरें पर तारणहार ।।7 ।।

ऐसा मुनिपद मन को भाय, यही भाव निज में प्रगटाय।।
पाऊँ रत्नत्रय अविकार, वर्ते ज्ञानानन्द अपार ।।8।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२१ से २२२