मुक्तिपथ के आदर्श, प्रभु महावीर हैं।
मेरे प्रभु हैं महान्, देवादिक करते गुणगान ।।
धरते योगीश्वर नित ध्यान, ऐसे महावीर हैं।। टेक ।।
महावीर भगवान् की, मूर्ति महा सुखकार ।
नासा दृष्टि दिखावती, अन्तर सुख भंडार ।। 1।।
प्रभु दर्शन उपजावता, सबको परमानन्द ।
भाव विशुद्धि हो सहज, कटें कर्म के फन्द।। 2।।
विषय-कषायारम्भ तजूँ, धर निर्ग्रन्थ स्वरूप ।
अपनी प्रभुता नाथ सम, प्रगटाऊँ शिव रूप।। 3।।
दर्शाया शुद्धात्मा, धन्य जिनेश्वर देव।
निजानन्द रस में पग्यो, शीस झुके स्वयमेव।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११९ से १२०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’