मुक्ति की आशा लगी, निज ब्रह्म को जाना नहीं
(सोरठ)
मुक्ति की आशा लगी, निज ब्रह्म को जाना नहीं ॥टेर ॥
घर छोड़ के योगी हुआ, अनुभाव को ठाना नहीं।
जिन धर्म को अपना सगा, अज्ञान तैं माना नहीं ॥१॥
बाहिर मैं तू त्यागी हुआ, बातिन तेरा छाना नहीं ।
ऐ यार अपनी भूल से, विष बेल फल खाना नहीं ॥२॥
संसार को त्यागे बिना, निर्वाण पद पाना नहीं।
संतोष बिन अब ‘नैनसुख’ तुमको मजा आना नहीं ॥३॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७ (विभिन्न कवियों के भजन)
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