तर्ज : वीर जी की सेना चली…
मुक्ति के मार्ग में भव्य उल्लास से, आओ आंनदमय मुक्ति का मार्ग है। ।टेक।।
बाह्य संयोगों का कुछ ठिकाना नहीं, इन्द्र चक्री का पद भी विनाशीक है।
साथी कोई नहीं मोह मिथ्या तजो, एक शुद्धात्मा ही उपादेय है।।1।।
इन्द्रिय भोगों का सुख मात्र है कल्पना, सत्य मानों ये दुखों का ही मूल है।
तुम स्वयं ही विचारो मिला सुख या दुःख, व्यर्थ जीवन न खोओ करो आत्म हित । ।2 ।।
भाग्य से देव-गुरू-धर्म साँचे मिले, पाई जिनवाणी सुन तत्त्व निर्णय करो।
जो सदा ज्ञाता पर-भावों से शून्य है, हूँ सहज ज्ञेय हूँ मैं वही यों लखो। ।3।।
शेष सब भिन्न रागादि दुःख रूप है, सुख का कारण तो वीतराग विज्ञान है।
हेय रागादि आदेय वीतरागता, आश्रय लेने के योग्य है शुद्धात्मा ।।4।।
भटके पर्याय दृष्टि से संसार में, भार कर्तृत्व का झूठा ढोते रहे।
द्रव्यदृष्टि करो आत्म अनुभव करो, ज्ञाता दृष्टा रहो सहज संयम धरो ।।5 ।।
होओ निर्ग्रन्थ, निर्द्वन्द निर्बन्ध ही, पूर्व कर्मों की समता से कर निर्जरा।
शुद्ध चिद्रूप को ध्याते-ध्याते अहो ! पाओ आनंद से मुक्ति साम्राज्य है।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’