मुक्ति का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है, स्वाधीन मार्ग तो निर्ग्रन्थ है | mukti ka marga to nirgrantha hai svadhina marga to nirgrantha hai

मुक्ति का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है, स्वाधीन मार्ग तो निर्ग्रन्थ है ।। टेक ।।

परमार्थ मार्ग तो निर्ग्रन्थ है, सत्यार्थ मार्ग तो निर्ग्रन्थ है।
आतम स्वभाव अहो निर्ग्रन्थ है, वस्तु स्वभाव अहो निर्ग्रन्थ है ।। 1 ।।

आनन्दमय मार्ग तो निर्ग्रन्थ है, समतामय मार्ग तो निर्ग्रन्थ है।
सन्तों का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है, वीरों का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है।। 2 ।।

आराध्य का रूप निर्ग्रन्थ है, आराधना सहज निर्ग्रन्थ है।
अनुभव का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है, थिरता का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है ।। 3 ।।

जहाँ न आरम्भ, जहाँ न परिग्रह, जहाँ न हिंसा, जहाँ न विग्रह।
जहाँ न अनुबन्ध, जहाँ न प्रतिबन्ध, शान्ति का मार्ग तो निर्ग्रन्थ है ।। 4 ।।

पर से न सम्बन्ध, सन्तुष्ट निज में, वाँछा न कोई, तृप्त स्वयं में।
निर्भय हो रमते निर्ग्रन्थ निज में, अलौकिक मार्ग तो निर्ग्रन्थ है ।। 5 ।।

कर्म बन्ध जहाँ सहज हैं झड़ते, आत्मीक गुण सहज प्रगटते।
इन्द्रादिक चरणों में नमते, प्रभुतामय मार्ग तो निर्ग्रन्थ है।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २४२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’