प्रथमोऽध्यायः (भाग 1/2)
श्रीमन्तं मुक्तिभर्त्तारं वृषभं वृषनायकं।
धर्मतीर्थकरं ज्येष्ठं वन्देऽनन्तगुणार्णवम् ॥१॥
अर्थ: जो भगवान् श्री वृषभदेव स्वामी अंतरंग-बहिरंग लक्ष्मी से सुशोभित हैं, जो मुक्तिरूपी स्त्री के स्वामी हैं, धर्म के नायक हैं, धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले हैं, इस युग के तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर हैं और अनंत गुणों के समुद्र हैं, ऐसे भगवान् वृषभदेव की वंदना करता हूँ।
आचाराङ्गं बभाषे यो यत्याचारनिरूपकम्।
आदौ चतुर्थकालस्यात्राद्यं मोक्षाप्तये सताम् ॥२॥
तमादितीर्थकर्त्तारं यत्याचारपरायणम्।
आचारशुद्धये स्तौमि धर्मतीर्थप्रवर्त्तकम् ॥३॥
अर्थ (श्लोक 2 से 3): सज्जन पुरुषों को इस भरतक्षेत्र में आज भी मोक्ष प्राप्त करने के लिए इस चतुर्थकाल के प्रारम्भ में ही जिन्होंने मुनियों के आचरणों का निरूपण किया था तथा जो मुनियों के आचरण पालन करने में स्वयं तत्पर हुए थे और जिन्होंने इस युग में धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति की है, ऐसे प्रथम तीर्थंकर भगवान् वृषभदेव की मैं आचार्य (सकलकीर्ति) अपने आचरण शुद्ध करने के लिए स्तुति करता हूँ।
येन प्रकाशितं लोकेऽस्मिन्नाचाराङ्ग-मूर्जितम्।
हीयमानमपि स्थास्यति यावदन्तिमं दिनम् ॥४॥
कालस्य पञ्चमस्यादौ तं नौम्याचारपारगम्।
श्रीवर्द्धमाननामानं मिथ्याज्ञानतमोपहम् ॥५॥
अर्थ (श्लोक 4 से 5): जो भगवान् वर्धमान स्वामी मिथ्याज्ञानरूपी अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य के समान हैं और जिन्होंने इस संसार में अत्यन्त देदीप्यमान आचारांग को प्रकाशित किया है तथा उन वर्धमान स्वामी का कहा हुआ जो आचारांग इस पंचमकाल के आदि में दिनोंदिन घटता हुआ भी इस पंचमकाल के अंत तक बराबर बना रहेगा, ऐसे आचारांग को निरूपण करने वाले और आचार पालन करने में पारंगत भगवान् वर्धमान स्वामी को मैं नमस्कार करता हूँ।
शेषा ये तीर्थकर्त्तार आचाराङ्गप्रवर्त्तिनः।
आचारभूषिता वन्द्यास्त्रिजगत्स्वामिभिः स्तुताः ॥६॥
अजिताद्या जिनाधीशा विश्वभव्यहितोद्यताः।
सन्तु ते मे स्वभूत्याप्त्यै वन्दिताः संस्तुता मया ॥७॥
अर्थ (श्लोक 6 से 7): भगवान् अजितनाथ से लेकर भगवान् पार्श्वनाथ तक मध्य के तीर्थंकर भी आचारांग की प्रवृत्ति करने वाले हैं, आचार से विभूषित हैं, तीनों लोकों के स्वामी जिनकी वंदना करते हैं, स्तुति करते हैं तथा जो समस्त भव्यजीवों के हित करने में उद्यत रहते हैं और मैंने भी जिनकी वंदना और स्तुति की है, ऐसे वे तीर्थंकर परमदेव मुझे अपनी अनंतचतुष्टयरूपी विभूति की प्राप्ति के लिए हों।
विदेहे पूर्वसंज्ञे यः प्रवर्त्तयति मुक्तये।
अद्यापि भव्यजीवानामाचाराङ्गं सुवृत्तदम् ॥८॥
तस्मै तीर्थकृते श्रीसीमंधरस्वामिने नमः।
तद्गुणाय जिनेन्द्राय ह्यनन्तगुणसिंधवे ॥९॥
अर्थ (श्लोक 8 से 9): जो भगवान् सीमंधरस्वामी पूर्व विदेह क्षेत्र में भव्यजीवों को मोक्ष प्राप्त करने के लिए आज भी निर्मल चरित्र को बतलाने वाले आचारांग की प्रवृत्ति कर रहे हैं, जो अनंतगुणों के समुद्र हैं और जिनेन्द्र हैं, ऐसे भगवान् सीमंधरस्वामी को उनके गुण प्राप्त करने के लिए मैं नमस्कार करता हूँ। जो साधु आचार आदि समस्त अंगों को जानते हैं, जो तीनों काल में योग धारण करते हैं, जिनका शरीर उग्रतप, दीप्ततप, महातप और घोरतप आदि तपों से अलंकृत है, जो तीनों लोकों के द्वारा पूज्य हैं, प्रमादरहित हैं, जितेन्द्रिय हैं और जो गुफा वा पर्वतों आदि में निवास करते हैं, उन साधु परमेष्ठियों के लिए मैं तपश्चरण की प्राप्ति के लिए नमस्कार करता हूँ।
येऽत्राद्धर्द्धिकद्वीपद्वये सन्ति जिनाधिपाः।
आचारवर्त्तिनः पुंसां दिव्येन ध्वनिना भुवि ॥१०॥
आचारभूषणा अन्तातीताः कालत्रयोद्भवाः।
वन्द्याः स्तुत्याः सुरेन्द्राद्यैस्ते मे सन्त्वस्य सिद्धये ॥११॥
अर्थ (श्लोक 10 से 11): इस ढाईद्वीप में भूत, भविष्यत्, वर्तमान तीनों कालों में होने वाले जिन तीर्थंकर वा सामान्य केवलियों ने अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा इस संसार में भव्यजीवों के लिए आचारांग की प्रवृत्ति की है, जो आचार से विभूषित हैं और इन्द्रादिक देव भी जिनकी वंदना और स्तुति सदा किया करते हैं, ऐसे अनंत तीर्थंकर वा सामान्य केवली भगवान् मेरे इस कार्य की सिद्धि करें। जिन श्री वृषभसेन महाचतुर गणधर ने चौथे काल के प्रारम्भ में मोक्ष प्राप्त करने, कराने के लिए अपने गुरु भगवान् वृषभदेव से उस अंग का अर्थ लेकर आचारांग की रचना की है तथा जो सप्त ऋद्धियों से विभूषित हैं और चारों ज्ञानों को धारण करने वाले हैं, ऐसे कवियों के इन्द्र भगवान् वृषभसेन गणधर की मैं उनके गुणों की प्राप्ति के लिए स्तुति करता हूँ।
आचाराङ्गोक्तमार्गेणाराध्य रत्नत्रयं द्विधा।
तपसाहृत्य कर्माणि येऽगुर्निर्वाणमद्भुतम् ॥१२॥
आचारफलमाप्तांस्तान् सिद्धान् लोकाग्रवासिनः।
दिव्याष्टगुणशर्माब्धीन् वन्देऽनन्तान् शिवाप्तये ॥१३॥
अर्थ (श्लोक 12 से 13): जिन्होंने आचारांग में कही हुई विधि के व्यवहार और निश्चय दोनों प्रकार के रत्नत्रय का आराधन कर, तपश्चरण के द्वारा समस्त कर्मों का नाश किया है और इस प्रकार अद्भुत मोक्षपद प्राप्त किया है तथा जो इस प्रकार आचार पालन करने के फल को प्राप्त हुए हैं, जो लोक शिखर पर विराजमान हैं और दिव्य आठ गुणरूपी कल्याण के समुद्र हैं, ऐसे अनंत सिद्धों को मैं मोक्ष प्राप्ति के लिए वंदना करता हूँ। जिन भगवान् गौतम गणधर ने मुनियों के आचार की प्रवृत्ति करने के लिए तथा अनाचार का निषेध करने के लिए पदरूप से आचारांग की उत्कृष्ट रचना की है तथा उसी आचारांग का अंश आज भी विद्यमान है और आगे भी अवश्य निःसंदेह बना रहेगा, ऐसे गुणों के समुद्र भगवान् गौतम गणधर की मैं स्तुति करता हूँ।
आचरन्ति स्वयं साक्षात् पञ्चाचारं सुखाकरम्।
आचारशास्त्रयुक्त्या ये शिष्याणां चारयन्ति च ॥१४॥
स्वर्गमुक्त्यादिसौख्याय सूरयो विश्ववन्दिताः।
तेषां पादाम्बुजान् नौमि पञ्चाचारविशुद्धये ॥१५॥
अर्थ (श्लोक 14 से 15): जो आचार्य सुख की खान हैं, ऐसे पाँचों आचारों को स्वयं साक्षात् पालन करते हैं, जो आचार शास्त्रों से सदा सुशोभित रहते हैं, जो शिष्यों को स्वर्ग-मोक्ष आदि के सुख प्राप्त कराने के लिए उन्हीं पंचाचारों को उन शिष्यों से सदा पालन कराते हैं और समस्त संसार जिनकी वंदना करता है, ऐसे आचार्य परमेष्ठी के चरण कमलों को मैं अपने पंचाचार की विशुद्धि के लिए सदा नमस्कार करता हूँ।
आचारप्रमुखाङ्गानि निष्प्रमादाः पठन्ति ये।
पाठयन्ति विनेयानां ज्ञानायाज्ञानहानये ॥१६॥
पाठकास्त्रिजगद्वन्द्या महामतिविशारदाः।
विश्वदीपाः श्रये तेषां क्रमाब्जानङ्गहेतवे ॥१७॥
अर्थ (श्लोक 16 से 17): जो उपाध्याय अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए या अज्ञान को दूर करने के लिए प्रमाद रहित होकर आचारांग आदि अंगों को सदा पढ़ते रहते हैं और शिष्यों को पढ़ाते रहते हैं तथा जो तीनों लोकों के द्वारा वंदनीय हैं, महाबुद्धि को धारण करने से जो अत्यन्त चतुर हैं और जो संसार के समस्त पदार्थों का स्वरूप दिखलाने के लिए दीपक के समान हैं, ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी के चरण कमलों का मैं उन समस्त अंगों की प्राप्ति के लिए आश्रय लेता हूँ।
साधवो ये त्रिलोकार्च्या निष्प्रमादाः जितेन्द्रियाः।
गुहाद्र्यादिकृतावासास्तेभ्यः सुतपसे नमः ॥१८॥
प्रारम्भे तुर्यकालस्य रचितं येन धीमता।
आचाराङ्गं शिवाप्त्यै च वृषभसेनगणेशिना ॥१९॥
गुरोस्तदर्थमादाय तं सप्तर्द्धिविभूषितम्।
चतुर्ज्ञानधरं स्तौमि कवीन्द्रं तद्गुणाप्तये ॥२१॥
पदरूपेण येनात्राचाराङ्गं रचितं परम्।
आचारवृत्तयेऽनाचारनिषेधाय योगिनाम् ॥२२॥
तस्यांशं वर्त्ततेऽद्यापि स्थास्यत्यग्रे न संशयः।
स्तुवेऽहं तं गणाधीशं गौतमं गुणवारिधिम् ॥२३॥
शेषा गणधरा आचाराङ्गादिरचने क्षमाः।
चतुर्ज्ञानाखिलार्थज्ञा ये महाचारभूषिताः ॥२४॥
मोक्षमार्गप्रणेतारो महान्तो मुक्तिगामिनः।
तान् सर्वान् शिरसा वन्दे तत्समस्तगुणाप्तये ॥२५॥
अर्थ (श्लोक 24 से 25): बाकी के जितने गणधर हैं जो कि आचारांगादिक की रचना करने में समर्थ हैं, जो अपने चारों ज्ञानों से समस्त पदार्थों के जानकार हैं, जो महा-आचारों से विभूषित हैं, मोक्षमार्ग का निरूपण करने वाले हैं, जो महापुरुष हैं और मोक्षगामी हैं, ऐसे समस्त गणधरों को मैं उनके समस्त गुण प्राप्त करने के लिए मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।
यत्प्रसादेन मेऽत्राभूत् रागदूरा महामतिः।
समर्थानेकशास्त्राणां रचने शुभदाऽनघा ॥२६॥
सा जिनेन्द्रमुखोत्पन्ना भारती पूजिता स्तुता।
वर्द्धिता श्रीगणेशाद्यैर्मया चास्तु चिदे मम ॥२७॥
अर्थ (श्लोक 26 से 27): भगवान् जिनेन्द्रदेव के मुख से उत्पन्न हुई जिस सरस्वती के प्रसाद से मेरी यह महाबुद्धि रागरहित होकर अनेक शास्त्रों की रचना करने में समर्थ हुई है तथा जो शुभ (पुण्य) देने वाली है, पाप रहित है, गणधरदेवों ने जिसकी पूजा की है, स्तुति की है और खूब वृद्धि की है तथा मैंने भी जिसकी पूजा स्तुति और वृद्धि की है, ऐसी सरस्वती देवी मेरे शुद्ध आत्मा की प्राप्ति करो।
अङ्गपूर्वप्रकीर्णादीनामाचाराद्यर्थसूचकान् ।
त्रिजगद्दीपकान् सर्व्वास्तदर्थाप्त्यै भजेऽन्वहम् ॥२८॥
अर्थ: इस प्रकार अंग, पूर्व और प्रकीर्ण आदि में कहे हुए आचार आदि के अर्थ को सूचित करने वाले और तीनों जगत् के पदार्थों को प्रकाशित करने वाले जितने भी महापुरुष हैं, उन सबकी मैं उन अंग, पूर्व और प्रकीर्णक का अर्थ जानने के लिए प्रतिदिन सेवा करता हूँ।
सुधर्मसूरिजम्बूस्वामिनौ केवललोचनौ।
शुद्धाचारान्वितौ नौमि स्वाचाराङ्गप्ररूपकौ ॥२९॥
अर्थ: केवलज्ञानरूपी नेत्रों को धारण करने वाले, शुद्धाचार को पालन करने वाले और अपने आचारांग को निरूपण करने वाले सुधर्मा गणधर और जम्बूस्वामी को भी मैं नमस्कार करता हूँ।
विष्णुश्च नंदिमित्राख्योऽपराजितो मुनीश्वरः।
गोवर्द्धनो मुमुक्षुश्च भद्रबाहुर्जगन्नुतः ॥३०॥
श्रुतकेवलिनोऽत्रैते पञ्चाचारादिदेशिनः।
परमाचारसम्पन्नाः कीर्त्तिताः सन्तु मे चिदे ॥३१॥
अर्थ (श्लोक 30 से 31): (१) विष्णु (२) नंदिमित्र (३) मुनिराज अपराजित (४) मोक्ष की इच्छा करने वाले गोवर्द्धन और समस्त संसार जिनको नमस्कार करता है ऐसे (५) भद्रबाहु; ये पाँच इस पंचमकाल में श्रुतकेवली हुए हैं। ये पाँचों ही श्रुतकेवली पंचाचार का उपदेश देने वाले हैं और परमोत्कृष्ट आचार को पालन करने वाले हैं, इसलिए मैं उनकी स्तुति करता हूँ जिससे कि मुझे शुद्ध आत्मा की प्राप्ति हो।
विशाखाचार्यमुख्या ये सूरयो बहवो भुवि।
आचाराङ्गादिशास्त्रज्ञाः दद्युस्ते मे स्तुताः श्रुतम् ॥३२॥
अर्थ: इस संसार में विशाखाचार्य को आदि लेकर और भी अनेक आचार्य हुए हैं जो कि आचारांगादि शास्त्रों के जानकार हैं, उनकी मैं स्तुति करता हूँ, वे सब मुझे श्रुतज्ञान को प्रदान करें।
कवीन्द्रा वादिनो ये श्रीकुन्दकुन्दादिसूरयः।
तान् स्तुवे सत्कवित्वाय स्वाचारश्रुतसूचकान् ॥३३॥
अर्थ: आचार प्ररूपक श्रुतज्ञान का निरूपण करने वाले और भी जो कविराज या वादी मुनि हुए हैं अथवा श्री कुन्दकुन्दादिक आचार्य हुए हैं, उन सबकी मैं श्रेष्ठ कवित्व प्राप्त करने के लिए स्तुति करता हूँ।
बाह्यान्तर्ग्रन्थनिर्मुक्तान् दिग्वस्त्रालङ्कृतान् परान्।
मदीयांश्च गुरून्नौमि विश्वान् गुरुगुणाप्तये ॥३४॥
अर्थ: जो बाह्य और अंतरंग परिग्रह से सर्वथा रहित हैं, जो दिशारूपी वस्त्रों से ही सुशोभित हैं अर्थात् दिगम्बर हैं और इसलिए जो उत्कृष्ट हैं, ऐसे अपने समस्त गुरुओं के लिए भी मैं उनके श्रेष्ठ गुण प्राप्त करने के लिए नमस्कार करता हूँ।
इति तद्विघ्नहान्यै च माङ्गल्यार्थप्रसिद्धये।
स्तुता ये वन्दिता ग्रन्धारम्भेऽर्हच्छ्रुतयोगिनः ॥३५॥
इष्टा इष्टाप्तये सन्तु प्रत्यूहान् घ्नन्तु तस्य च।
कुर्वन्तु मङ्गलं ते मे विश्वमाङ्गल्यकारिणः ॥३६॥
अर्थ (श्लोक 35 से 36): इस प्रकार ग्रन्थ के प्रारम्भ में इसकी रचना में होने वाले विघ्नों को दूर करने के लिए तथा मंगलमय पदार्थों की प्राप्ति के लिए जिन अरहंत, शास्त्र और मुनियों की वंदना की है या उनकी स्तुति की है, ऐसे वे समस्त संसार में मंगल करने वाले देव, शास्त्र, गुरु, इष्ट या पंचपरमेष्ठी मुझे इष्ट की प्राप्ति के लिए हों अर्थात् मेरे ग्रन्थ को पूर्ण करें, उसमें होने वाले विघ्नों को नष्ट करें और मेरे लिए मंगल करें।
इष्टदेवान् प्रणम्येति विज्ञायार्थान् परान् शुभान्।
मूलाचारादिसद्ग्रन्थानामाचारप्रवर्त्तये ॥३७॥
महाग्रन्थं करिष्येऽहं श्रीमूलाचारदीपकम्।
हिताय मे यतीनां च शुद्धाचारार्थदेशकम् ॥३८॥
अर्थ (श्लोक 37 से 38): इस प्रकार मैं अपने इष्टदेवों को नमस्कार कर तथा शुभ और श्रेष्ठ अर्थों को जानकर, मूलाचार आदि श्रेष्ठ ग्रन्थों में कहे हुए आचारों की प्रवृत्ति करने के लिए तथा अपना और मुनियों का हित करने के लिए, शुद्धाचार के स्वरूप का निरूपण करने वाले ‘मूलाचार-प्रदीप’ नाम के महाग्रन्थ की रचना करता हूँ।
आचारांग का वर्णन
आचाराङ्गं यदष्टादशसहस्त्रपदान्वितम्।
श्रुतकेवलिभिः प्रोक्तं ह्यर्थैर्गाम्भीरमब्धिवत् ॥३९॥
अर्थ: आचारांग नाम के अंग में अठारह हजार पद हैं। वह श्रुतकेवलियों के द्वारा कहा हुआ है तथा समुद्र के समान अर्थों से महा गंभीर है।
शत षोडश कोट्यो वा चतुस्त्रिंशच्च कोटयः।
त्र्यशीतिरथलक्षाण्यष्टासप्ततिशतान्यपि ॥४०॥
अष्टाशीतिश्च सद्गुर्णा इति संख्या जिनोदिता।
आगमेऽक्षरसंख्याभिः पदैकस्य न चान्यथा ॥४१॥
अर्थ (श्लोक 40 से 41): भगवान् जिनेन्द्रदेव ने अपने कहे हुए आगम में एक-एक पद के अक्षरों की संख्या सोलह अरब चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अट्ठासी बतलाई है। यह अन्यथा नहीं है।
एतदङ्गमहाग्रन्थं, समस्ताचारदीपकम्।
मया प्रोक्तं कथं शक्यं कविना स्वल्पबुद्धिना ॥४२॥
तथापि पूर्वसूर्यादिप्रणामाजितपुण्यतः।
स्तोकं सारं करिष्यामि ग्रन्थमाचारसूचकम् ॥४३॥
अर्थ (श्लोक 42 से 43): समस्त आचारांग को प्रकाशित करने वाले दीपक के समान यह आचारांग नाम का बड़ा ग्रन्थ है। यह इतना बड़ा महाग्रन्थ भला अत्यन्त थोड़ी-सी बुद्धि को धारण करने वाले मुझ ऐसे कवि से कैसे कहा जा सकता है तथापि पहले के आचार्यों को प्रणाम करने से उत्पन्न हुए पुण्य के प्रभाव से आचार को सूचित करने वाले बहुत ही स्वल्प और सारभूत ग्रन्थ की रचना मैं करूँगा।
तस्यादौ ये जिनैः प्रोक्ता अष्टाविंशतिसंख्याकाः।
परा मूलगुणाः सारा मूलभूताः सुयोगिनाम् ॥४४॥
गुणानां चात्र दीक्षाया आचारस्य शिवङ्करान्।
तान् प्रवक्ष्ये स्वशक्त्याहं सर्वान् सर्वार्थसाधकान् ॥४५॥
अर्थ (श्लोक 44 से 45): इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में भगवान् जिनेन्द्रदेव के कहे हुए और श्रेष्ठ मुनियों के मूलभूत २८ मूलगुणों को कहूँगा। ये मूलगुण सर्वोत्कृष्ट हैं, मुनियों के गुण, दीक्षा और आचार को मंगल करने वाले हैं और समस्त अर्थों की सिद्धि करने वाले हैं, उन्हीं सबको मैं अपनी शक्ति के अनुसार कहूँगा।
२८ मूलगुणों का संक्षिप्त वर्णन
महाव्रतानि पञ्चैव परा समितयस्तथा।
पञ्चेन्द्रियनिरोधश्च लोच आवश्यकानि षट् ॥४६॥
अचेलत्वं ततोऽस्नानं धराशयनमेव हि।
अदन्तघर्षणं रागदूरं च स्थितिभोजनम् ॥४७॥
एकभक्तं समासेनामी सन्मूलगुणाबुधैः।
विज्ञेयाः कर्महन्तारः शिवशर्मगुणाकराः ॥४८॥
अर्थ (श्लोक 46 से 48): ५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इन्द्रियों का निरोध, ६ आवश्यक, (१) केशलोंच (२) नग्नत्व धारण करना (३) स्नान नहीं करना (४) दंत-घर्षण नहीं करना (५) रागरहित खड़े होकर भोजन करना (६) दिन में एकबार ही भोजन करना और (७) भूमि पर शयन करना ये संक्षेप में २८ मूलगुण हैं। ये समस्त मूलगुण कर्मों को नाश करने वाले हैं और मोक्ष के सुख तथा सिद्धों में होने वाले समस्त गुणों को देने वाले हैं। विद्वानों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए।
पुनरेतान् प्रवक्ष्यामि विस्तरेण पृथक् पृथक्।
विस्ताररुचिशिष्याणामनुग्रहाय सिद्धये ॥४९॥
अर्थ: ‘पुनरेतान् प्रवक्ष्यामि’ के अन्तर्गत प्रतिज्ञा-कथन। अर्थ विस्तार के साथ समझने वाले शिष्यों का उपकार करने के लिए तथा सिद्ध अवस्था प्राप्त करने के लिए आगे हम इनका अलग-अलग स्वरूप विस्तार के साथ कहते हैं।
महाव्रतों की परिभाषा
हिंसाया अनृतास्तेयादब्रह्मतः परिग्रहात्।
कृत्स्नान्मनोवचःकायैः कृतकारितमाननैः ॥५०॥
सर्वथा विरतिर्या च क्रियते मुनिपुङ्गवैः।
महाव्रतानि तान्यत्र कथ्यन्ते योगिनां जिनैः ॥५१॥
अर्थ (श्लोक 50 से 51): श्रेष्ठ मुनिराज अपने मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से जो (१) हिंसा (२) झूठ (३) चोरी (४) कुशील और (५) परिग्रह इन ५ पापों का पूर्णरूप से सर्वथा त्याग कर देते हैं, उनको भगवान् जिनेन्द्रदेव मुनियों के महाव्रत कहते हैं।
(१) अहिंसा महाव्रत का लक्षण
हृदा च वपुषा वाचा कृतेन कारितेन च।
स्वानुमत्या प्रयत्नेन रक्षायात्र विधीयते ॥५२॥
मत्वात्मसदृशान् जीवान् नवभेदैः षडङ्गिनाम्।
मूलं सर्वव्रतानां स्यात् प्रथमं तन्महाव्रतम् ॥५३॥
अर्थ (श्लोक 52 से 53): छहों काय के समस्त जीवों को अपने आत्मा के समान समझकर मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना के ९ भेदों से प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना पहला अहिंसा महाव्रत कहलाता है। इस अहिंसा महाव्रत को समस्त व्रतों का मूल समझना चाहिए।
कायेन्द्रियगुणस्थान-मार्गणाश्च कुलान्यपि।
योनिश्च सर्वजीवानां ज्ञात्वा सम्यग् जिनागमे ॥५४॥
तेषां विविधजीवाना-मिति रक्षा प्रयत्नतः।
कर्त्तव्या मुनिभिर्नित्यं सर्वथा च कृतादिभिः ॥५५॥
अर्थ (श्लोक 54 से 55): मुनियों को सबसे पहले जिनागम के अनुसार समस्त जीवों की काय, इन्द्रिय, गुणस्थान, मार्गणा, कुल और योनियों को समझ लेना चाहिए और फिर उन अनेक प्रकार के जीवों की रक्षा सब तरह से, बड़े प्रयत्न से, मन-वचन-काय और कृत-कारित-अनुमोदना से करनी चाहिए।
शिलाद्रि-धातुरत्नादि-खरपृथ्व्यङ्गिनो बहून्।
मृदादि मृदुपृथ्वीकायांश्च सूक्ष्मेतरान् सदा ॥५६॥
हस्तपादाङ्गुलि काष्ठ-शलाका खर्परादिभिः।
न खनेत् खानयेन्नैव न लिखेन्नैव लेखयेत् ॥५७॥
न भञ्ज्याद् भञ्जयेन्नैव न हन्याद् घातयेन्न च।
जातु सङ्घट्टयेन्नैव पीडयेन्न दयार्त्तधीः ॥५८॥
खनन्तं च लिखन्तं वा भक्तवन्तं परं जनम्।
निघ्नन्तं घट्टयन्तं वा पीडयन्तं धरात्मनः ॥५९॥
नानुमन्येत योगीऽत्याद्यैः प्रकारैर्विराधना।
न कार्या मुनिभिस्तेषां योगैराद्यव्रताप्तये ॥६०॥
अर्थ (श्लोक 56 से 60): शिला, पर्वत, धातु, रत्न आदि में बहुत से कठिन पृथ्वीकायिक जीव रहते हैं तथा मिट्टी आदि में बहुत से कोमल पृथ्वीकायिक जीव रहते हैं तथा उनके भी स्थूल, सूक्ष्म आदि अनेक भेद हैं इसलिए मुनिराज अपने हाथ से, पैर से, उंगली से, लकड़ी से, सलाई से या खप्पर से पृथ्वीकायिक जीवसहित पृथ्वी को न खोदते हैं, न खुदवाते हैं, न उस पर लकीरें करते हैं, न कराते हैं, न उसे तोड़ते हैं, न तुड़वाते हैं, न उस पर चोट पहुँचाते हैं, न चोट पहुँचवाते हैं तथा अपने हृदय में दया बुद्धि धारण कर न उस पृथ्वी को परस्पर रगड़ते हैं, न उसको किसी प्रकार की पीड़ा देते हैं। यदि कोई अन्य भक्त पुरुष उस पृथ्वी को खोदता है या उस पर लकीरें करवाता है, उस पर चोट मारता है, रगड़ता है या अन्य किसी प्रकार से उन जीवों को पीड़ा पहुँचाता है तो वे योगी उसकी अनुमोदना भी नहीं करते। इस प्रकार वे मुनिराज अहिंसा महाव्रत को प्राप्त करने के लिए उन पृथ्वीकायिक जीवों की विराधना कभी नहीं करते।
ये पृथ्वीकायिका जीवा ये पृथ्वीकायमाश्रिताः ।
पृथ्वीकायसमारम्भाद् ध्रुवं तेषां विराधना ॥६१॥
तस्मात् पृथ्वीसमारम्भो द्विविधस्त्रिविधेन च।
यावज्जीवं न योग्योऽत्र जिनमार्गानुचारिणाम् ॥६२॥
अर्थ (श्लोक 61 से 62): पृथ्वीकाय का समारंभ करने से, पृथ्वीकायिक जीवों की तथा पृथ्वीकाय के आश्रय रहने वाले जीवों की विराधना अवश्य होती है, इसलिए जिनमार्ग के अनुसार चलने वाले मुनियों को अपने जीवन पर्यंत मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से दोनों प्रकार के पृथ्वी का समारंभ कभी नहीं करना चाहिए।
न श्रद्दधाति यो जीवान् पृथ्वीकायगतानिमान्।
स भवेद् दीर्घसंसारी लिङ्गस्थोऽप्यतिदुर्मतिः ॥६३॥
अर्थ: जो दुर्बुद्धि जिनलिंग धारण करके भी, पृथ्वीकाय में प्राप्त हुए जीवों का, श्रद्धान नहीं करता है, उसे दीर्घ संसारी ही समझना चाहिए।
मत्वेति तत्समारम्भो जातु कार्यों न योगिभिः।
स्वेन वान्येन मुक्त्याप्त्यै चैत्यगेहादिकारणैः ॥६४॥
अर्थ: यही समझकर मुनियों को मोक्ष प्राप्त करने के लिए, स्वयं वा दूसरे के द्वारा, जिनालय आदि बनवाकर भी पृथ्वी का समारंभ नहीं करना चाहिए।
(जलकायिक जीवों का रक्षण)
स्थूलाणुबिन्दुमेघावश्यादिजलदेहिनाम् ।
न कुर्यात्कारयेन्नैव स्पर्शसङ्घट्टनादिकम् ॥६५॥
अर्थ: मेघ वा बर्फ की बूँदों में रहने वाले जलकायिक जीवों का, स्पर्श वा संघट्टन न कभी करना चाहिए और न कराना चाहिए।
बाधां चान्यं च कुर्वन्तं मनसा नानुमन्यते।
वाचाङ्गेन यतिः शौच-पादप्रक्षालनादिभिः ॥६६॥
जीवा अप्कायिका येऽत्र ये चाप्कायं समाश्रिताः।
अप्कायाङ्गिसमारम्भात्स्फुटं तेषां परिक्षयः ॥६७॥
तस्मादपां समारम्भो द्विधा वाक्कायमानसैः ।
यावज्जीवं मनाक् योग्यो नात्रार्हद्वेषधारिणाम् ॥६८॥
अर्थ (श्लोक 66 से 68): इसी प्रकार शौच, पाद प्रक्षालन आदि के द्वारा, उन जीवों को बाधा देने वाले, अन्य पुरुषों को, मन-वचन-काय से कभी अनुमोदना नहीं करनी चाहिए क्योंकि जलकायिक जीवों से भरे हुए, जल का समारंभ करने से (जल को काम में लाने से), जलकायिक जीव और जलकाय के आश्रय रहने वाले जीवों का नाश अवश्य ही होता है। इसलिए अरहंत के भेष को धारण करने वाले मुनियों को मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से जीवनपर्यन्त दोनों प्रकार के जल का समारंभ कभी नहीं करना चाहिए।
न श्रद्दधाति योऽत्रैतान् प्राणिनोऽप्कायतामितान्।
स भवेद् दीर्घसंसारी लिङ्गस्थोऽपि कुमार्गगः ॥६९॥
ज्ञात्वेति जलकायानां कार्या हिंसा न जातुचित्।
शौचादिकारणैर्दक्षैर्मनोवाक्कायकर्मभिः ॥७०॥
अर्थ (श्लोक 69 से 70): जो मुनि अप्काय में प्राप्त हुए इन जीवों का श्रद्धान नहीं करता है, वह कुमार्गगामी दीर्घ संसारी होता है, इसलिए चतुर मुनियों को, शौचादि कार्यों में, जलकायिक जीवों की हिंसा, मन-वचन-काय से कभी नहीं करनी चाहिए।
(अग्निकायिक जीवों का रक्षण)
ज्वालाङ्गारार्चि शुद्धाग्न्यादितैजःकायिकात्मनाम् ।
शीतज्वरादिके जाते सति कार्यं न संयतैः ॥७१॥
अर्थ: मुनियों को शीतज्वरादि के उत्पन्न होने पर भी ज्वाला, अंगार, अग्नि की शिखा, शुद्ध अग्नि आदि तेजस्कायिक जीव सहित अग्नि को कभी काम में नहीं लाना चाहिए।
विध्यापनं कराद्यैः प्रज्वालनं च विराधनम्।
सङ्घटनं क्वचिद्घातं प्रच्छादनं कदर्थनम् ॥७२॥
अर्थ: मुनियों को अपने हाथ से या अन्य किसी उपाय से, न तो अग्नि को बुझाना चाहिए, न जलाना चाहिए, न उसका घात करना चाहिए।
अधश्चोर्ध्वं चतुर्दिक्षु विदिक्षु ह्यनलोऽखिलान्।
भस्मसात् कुरुते जीवान् षड्विधान् स्वोष्णतातपात् ॥७३॥
अर्थ: यह अग्नि अपनी उष्णता के संताप से ऊपर, नीचे, चारों दिशाओं, विदिशाओं में छहों प्रकार के समस्त जीवों को भस्म कर देती है।
तस्योद्योतेऽतिपापाढ्ये - ऽनेकसत्त्वक्षयङ्करे।
ईहते न यमी स्थातुं कदापि सति कारणे ॥७४॥
अर्थ: इस अग्न का उद्योत या प्रकाश जीवों का नाश करने वाला और पापरूप है, इसलिए मुनिराज कारण मिलने पर भी, उसके प्रकाश में कभी रहने की इच्छा नहीं करते।
पावीणं पच्छिमं वावि उदीचं दाहिणं तहा।
अधो दहदि उद्धं च दिसासु विदिसासु य ॥७५॥
अर्थ: यही बात दशवैकालिक ग्रन्थ में लिखी है-यह अग्नि पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे, दिशा तथा विदिशा में सब जीवों को जला देती है।
एसो जीवोत्ति अक्खादो हव्ववाहो ण संसओ।
तमुज्जोवपदावड्ढं मणसावि णं पच्छए ॥७६॥
अर्थ: अतएव अपने मन से, अग्नि के प्रकाश की कभी इच्छा नहीं करनी चाहिए।
ये तेजस्कायिकाजीवा येऽत्र तेजोऽङ्गमाश्रिताः।
तेजःकायसमारम्भाद् मुक्षु तेषां विहिंसनम् ॥७५॥
अर्थ: इसलिए अग्नि का समारंभ करने से तेजस्कायिक जीवों की तथा तेजस्काय के आश्रित रहने वाले जीवों की हिंसा अवश्य होती है।
तस्मात्तेजःसमारम्भस्त्रियोगैर्द्विविधः क्वचित्।
निर्गन्थसंयतानां च यावज्जीवं हि नोचितः ॥७६॥
अर्थ: इसलिए निर्ग्रंथ मुनियों को अपने जीवनपर्यंत मन, वचन, काय से दोनों प्रकार की अग्नि का समारंभ कभी नहीं करना चाहिए।
एतान् यो मन्यते नैवाप्तान् तेजोऽङ्गं च देहिनः।
मिथ्यादृष्टिः स विज्ञेयो लिङ्गस्थोऽप्यतिपापभाक् ॥७७॥
अर्थ: जो मुनि तेजस्काय में प्राप्त हुए जीवों को नहीं मानता, वह मुनि होकर भी अत्यन्त पापी, मिथ्यादृष्टि है।
ज्ञात्वेत्यग्निसमारम्भोऽनन्तजीवक्षयङ्करः ।
मनोऽङ्गवचनैर्जातु न कार्यः प्रेक्षणादिभिः ॥७८॥
अर्थ: इसलिए अग्नि के समारंभ को, अनंत जीवों का नाश करने वाला समझकर, देखने आदि कार्यों के लिए भी मन-वचन-काय से उसका समारंभ नहीं करना चाहिए।
(वायुकायिक जीवों का रक्षण)
उत्क्लियुद्भ्रमगुंजादि वातकायिकजन्मिनाम्।
वधोत्पत्तिकरं वातं कुर्याज्जातु न संयतः ॥७९॥
अर्थ: मुनियों को अनेक प्रकार की वायु में रहने वाले, वायुकायिक जीवों का घात करने वाली, वायु कभी उत्पन्न नहीं करनी चाहिए।
कारयेन्न च वस्त्रेण व्यजनेन करेण वा।
वस्त्रकोणेन पत्रेण सति दाहे परेण वा ॥८०॥
अर्थ: मुनियों को अधिक दाह होने पर भी वस्त्र से, पंखे से, हाथ से, वस्त्र के कोने से या पत्ते से, दूसरे के द्वारा भी कभी वायु उत्पन्न नहीं कराना चाहिए।
ये वातकायिका जीवा वातकायं च ये श्रिताः।
वातकायसमारम्भात् हिंसा तेषां न चान्यथा ॥८१॥
अर्थ: वायु का प्रारम्भ करने से, वायुकायिक जीवों की या वायुकाय के आश्रित रहने वाले जीवों की, हिंसा अवश्य होती है, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।
तस्माद्वातसमारम्भो द्विधा योगत्रयैरपि।
जिनमार्गानुलग्नानां यावज्जीवं न युज्यते ॥८२॥
अर्थ: इसलिए जिनमार्ग में लगे हुए मुनियों को, अपने जीवनपर्यंत मन, वचन, काय से दोनों प्रकार की वायु का समारंभ कभी नहीं करना चाहिए।
न श्रद्दधाति योऽत्रामून् जीवान् वाताङ्गमाश्रितान्।
संसारसागरे मग्नो द्रव्यलिंगी स केवलम् ॥८३॥
अर्थ: जो मुनि इन वातकाय के आश्रित रहने वाले जीवों का श्रद्धान नहीं करता है वह संसार सागर में डूबता है उसे केवल द्रव्यलिंगी ही समझना चाहिए।
मत्वेति स्वशरीरादौ वातः कार्यो न जातुचित्।
वाताङ्गवधकृद्दक्षैर्मुखाद्यैरुष्णपीडितैः ॥८४॥
अर्थ: यही समझकर चतुर मुनियों को, उष्णता से पीड़ित होने पर भी, वातकायिक जीवों को नाश करने वाली वायु, अपने मुख आदि से भी कभी उत्पन्न नहीं करनी चाहिए।
हरिताङ्कुरबीजानां पत्रपुष्पादिकाङ्गिनाम्।
वनस्पतिशरीराणां मुनिर्जातु करोति न ॥८५॥
कारयेन्न त्रिशुद्ध्याऽत्र छेदनं भेदनं क्वचित्।
प्रपीडनं वधं बाधां स्पर्शनं च विराधनाम् ॥८६॥
अर्थ (श्लोक 85 से 86): मुनिराज मन-वचन-काय की शुद्धता धारण करने के कारण हरित अंकुर, बीज, पत्र, पुष्प आदि के आश्रित रहने वाले वनस्पतिकायिक जीवों का छेदन, भेदन, पीड़न, वध, बाधा, स्पर्श और विराधना आदि न तो स्वयं करते हैं और न दूसरों से कराते हैं।
सैवालं पुष्पिकादीनामनन्तकायदेहिनाम् ।
विधेया जातु हिंसा न गमनागमनादिभिः ॥८७॥
अर्थ: मुनियों को गमन, आगमन आदि के करने में सैवाल (काई) और पुष्पिका (फूलन अथवा बरसात में होने वाला एक छोटा पौधा जिसके ऊपर सफेद फूल सा रहता है) आदि में रहने वाले अनंतकाय जीवों की हिंसा भी कभी नहीं करनी चाहिए।
ये वनस्पतिकाया ये वनस्पत्यङ्गमाश्रिताः।
वनस्पतिसमारम्भाद्वधस्तेषां हि देहिनाम् ॥८८॥
अर्थ: वनस्पति का समारंभ करने से, वनस्पतिकायिक जीव और वनस्पतिकाय के आश्रित रहने वाले जीवों की हिंसा अवश्य होती है।
तस्मात्तेषां समारम्भो द्विधा योगत्रिकैः क्वचित्।
मरणान्तं न योग्योऽर्हन्मुद्रास्वीकृतयोगिनाम् ॥८९॥
अर्थ: इसलिए अर्हन्मुद्रा यानि जिनलिंग को स्वीकार करने वाले मुनियों को अपने जीवनपर्यंत मन-वचन-काय से उन दोनों प्रकार की वनस्पति का समारंभ नहीं करना चाहिए।
न रोचतेऽत्र यो ह्येतान् जीवान् वनस्पतिं गतान्।
जिनधर्मबहिर्भूतो मिथ्यादृष्टिः स पापधीः ॥९०॥
अर्थ: जो मुनि वनस्पति में प्राप्त हुए इन जीवों को नहीं मानता, उसे जिन धर्म से बाहर, मिथ्यादृष्टि और पापी समझना चाहिए।
विज्ञायेति न कर्त्तव्या वनस्पतिविराधना।
हस्तपादादिभिर्जातु ह्यनन्तं सत्त्वनाशदा ॥९१॥
अर्थ: यही समझकर अपने हाथ, पैर आदि के द्वारा अनंत जीवों का नाश करने वाली वनस्पति की विराधना कभी नहीं करनी चाहिए।
त्रस जीवों की विराधना का निषेध
द्वित्रितूर्येन्द्रियाणां च पञ्चाक्षाणां त्रसात्मनाम्।
बाधा नैव विधातव्या मुनिभिर्यत्नतत्परैः ॥९२॥
अर्थ: प्रयत्न करने में तत्पर रहने वाले मुनियों को दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, त्रस जीवों को बाधा कभी नहीं करनी चाहिए।
गमने चासने स्थाने रात्रौ वा दृष्टिगोचरे।
सर्वथा च दयाकार्या मृदुपिच्छिकयेक्षणात् ॥९३॥
अर्थ: मुनियों को चलने में, बैठने में, शय्यासन करने में, रात्रि वा दिन में, कोमल पिच्छिका से वा देखकर जीवों पर सर्वथा दया करनी चाहिए।
त्रसकायाश्च ये जीवास्त्रसकायं हि ये श्रिताः।
त्रसकायसमारम्भात्तेषां बाधा वधोऽथवा ॥९४॥
अर्थ: त्रसकायिक जीवों का समारंभ करने से (त्रस जीव विशिष्ट वस्तुओं को काम में लाने से), त्रस जीवों की और त्रस जीवों के आश्रित रहने वाले जीवों की, बाधा अथवा उनका वध अवश्य होता है।
तस्मात् त्रससमारम्भो द्विधा योगैः कृतादिभिः।
योग्यो न मृत्युपर्यन्तं जिनवेषधृतात्मनाम् ॥९५॥
अर्थ: इसलिए जिनलिंग धारण करने वाले मुनियों को, अपने जीवनपर्यंत मन-वचन-काय और कृत, कारित, अनुमोदना से दोनों प्रकार के त्रस जीवों का समारंभ कभी नहीं करना चाहिए।
न मन्यतेऽङ्गिनाऽत्रैतान् यस्त्रसत्वं गतान् बहून्।
लिङ्गस्थोऽपि स पापात्मा भ्रमेद् घोरां भवाटवीम् ॥९६॥
अर्थ: जो मुनि, त्रस पर्याय को प्राप्त हुए अनेक प्रकार के जीवों को नहीं मानता है, वह पापी, जिनलिंग धारण करता हुआ भी संसाररूपी घोर वन में परिभ्रमण करता है।
विचिन्त्येति प्रयत्नेन दया त्रसाङ्गिनां सदा।
अनुष्ठेया न बाधा चात्राप्रमत्तैस्तपोधनैः ॥९७॥
अर्थ: इस प्रकार प्रमाद का त्याग करने वाले मुनियों को, प्रयत्नपूर्वक त्रस जीवों की दया पालनी चाहिए तथा उनकी बाधा कभी नहीं करना चाहिए।
त्रिशुद्धयेत्यनिशं योऽत्र रक्षां कुर्यात्षडङ्गिनाम्।
अप्रमत्तो भवेत् तस्याद्यं सम्पूर्णं महाव्रतम् ॥९८॥
अर्थ: यही समझकर जो मुनि अप्रमत्त होकर तथा मन, वचन, काय की शुद्धतापूर्वक, छहों प्रकार के जीवों की रक्षा के लिए पूर्ण प्रयत्न करता है, उसके पहला अहिंसा महाव्रत पलता है।
महाव्रती की शोभा
सर्वजीवकृपाक्रान्त-मना योऽखिलदेहिनाम्।
यत्नाचारी सुरक्षायै महाव्रती स नापरः ॥९९॥
अर्थ: जो मुनि अपने मन में समस्त जीवों की दया धारण कर, समस्त जीवों की रक्षा के लिए पूर्ण प्रयत्न करता है उसे ही महाव्रती समझना चाहिए उसके सिवाय, अन्य कोई महाव्रती नहीं हो सकता।
यतो जीवे मृते वा न कर्मबन्धः पदे पदे।
अयत्नचारिणां नूनं व्रतभङ्गोऽशुभा गतिः ॥१००॥
अर्थ: इसका भी कारण यह है कि जो मुनि यत्नाचार का पालन नहीं करता, उससे जीव मरे या न मरे, फिर भी उसके क्षण-क्षण में कर्मों का बंध होता ही है। इसके सिवाय, उनके व्रतों का भंग होता है और उससे अशुभ गति की प्राप्ति होती है।
क्वचिन्मृतेऽप्यहो जीवो यत्नाचारिमुनीशिनाम्।
न बन्धःकर्मणां किन्तु शुद्धिः स्याद्योगशुद्धितः ॥१०१॥
अर्थ: जो मुनि, अपनी प्रवृत्ति यत्नाचारपूर्वक करते हैं, उनसे यदि कोई जीव मर भी जाये, तो भी उनके कर्मों का बंध नहीं होता तथा उनके मन-वचन-काय की शुद्धि होने से, उनके आत्मा की शुद्धि और बढ़ जाती है।
तस्माद् व्रतार्थिनो दक्षाः यत्नं कुर्वन्तु सर्वथा।
सर्वजीवदयासिद्ध्यै त्रिशुद्ध्या सद्ब्रताय च ॥१०२॥
अर्थ: इसलिए अपने व्रतों की रक्षा की इच्छा करने वाले, चतुर मुनियों को मन-वचन-काय की शुद्धतापूर्वक, अपने श्रेष्ठ व्रतों की रक्षा के लिए और समस्त जीवों की दया पालन करने के लिए, पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए।
अहिंसा का गौरव
अहिंसा जननी प्रोक्ता सर्वेषां च व्रतात्मनाम्।
दृग्ज्ञानवृत्तरत्नानां खनी विश्व-हितङ्करा ॥१०३॥
अर्थ: भगवान् जिनेन्द्रदेव ने इस अहिंसा को समस्त व्रतों की माता बतलायी है और समस्त रत्नत्रय की खान बतलायी है तथा समस्त जीवों का हित करने वाली बतलायी है।
सूत्राधारेण तिष्ठन्ति दामहारादयो यथा।
कृपाधारेण सर्वे च योगिनां सद्गुणास्तथा ॥१०४॥
अर्थ: जिस प्रकार सूत की गाँठ से बनने वाले हार, सूत के ही आधार से ठहर सकते हैं, उसी प्रकार मुनियों के समस्त सद्गुण, जीवों की कृपा के आधार से ही ठहरते हैं।
शेषव्रतसमित्यादीन् ब्रुवन्ति श्रीजिनाधिपाः।
आद्यव्रतविशुद्ध्यर्थं केवलं च तपःक्रिया ॥१०५॥
अर्थ: इस अहिंसा महाव्रत के अतिरिक्त जितने भी व्रत, समिति और तपश्चरण आदि हैं, वे सब केवल एक इसी अहिंसा महाव्रत की विशुद्धि के लिए ही, भगवान् जिनेन्द्रदेव ने कहे हैं।
विना तेन व्रतेनास्मात् सर्वशेषव्रतव्रजम्।
व्यर्थं स्याच्च तपोघोरं यतीनां तुषखंडनम् ॥१०६॥
अर्थ: इस अहिंसा महाव्रत के बिना, बाकी के जितने व्रतों का समुदाय है अथवा जितना भी मुनियों का घोर तपश्चरण है, वह सब व्यर्थ है, भूसी को कूटने के समान असार है।
दयापूर्वमनुष्ठानं तपयोगादिभिः कृतम्।
भवेन्मोक्षतरोर्बीजं सतां विश्वर्धिकारणम् ॥१०७॥
अर्थ: यदि तपश्चरण, योग आदि के द्वारा किया हुआ अनुष्ठान, दयापूर्वक किया जाता है तो वह सज्जनों को मोक्षरूपी वृक्ष का बीज माना जाता है तथा समस्त ऋद्धियों का कारण बन जाता है।
कृत्स्नसत्त्वकृपाक्रान्तं यस्यासीन्मानसं शुभं।
सिद्धं समीहितं तस्य संवरो निर्जरा शिवम् ॥१०८॥
अर्थ: जिस मुनि का शुभ हृदय समस्त जीवों की कृपा से भरा हुआ है, उसके संवर, निर्जरा और मोक्ष आदि समस्त इष्ट पदार्थ सिद्ध हो जाते हैं।
क्रियते स्वगृहत्यागो दीक्षा च गृह्यते बुधैः।
केवलं करुणासिद्ध्यै तां विना तौ निरर्थकौ ॥१०९॥
अर्थ: बुद्धिमान् लोग जो अपने घर का त्याग करते हैं और दीक्षा ग्रहण करते हैं, वह केवल दया की सिद्धि के लिए ही करते हैं, यदि दया नहीं है, तो घर का त्याग और दीक्षा दोनों ही व्यर्थ हैं।
विज्ञायेति विधायोच्चैः सर्व जीवकदम्बकम्।
समानं स्वात्मनश्चित्ते रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥११०॥
अर्थ: यही समझकर तथा समस्त जीवों के समूह को अपने हृदय में, अपनी आत्मा के समान मानकर, बड़े प्रयत्न के साथ अच्छी तरह उनकी रक्षा करनी चाहिए।
गमनागमनोत्सर्गो प्रावृट्कालेऽङ्ग संकुले।
अहोरात्रे यतीन्द्रैश्चादान-निक्षेपणादिना ॥१११॥
ये यत्नचारिणोऽत्राहो पालयन्ति व्रतोत्तमम्।
तेषां सर्वव्रतान्येव यान्ति सम्पूर्णतां लघु ॥११२॥
अर्थ (श्लोक 111 से 112): वर्षाकाल में बहुत से जीवों का समुदाय उत्पन्न हो जाता है, इसीलिए मुनिराज उन दिनों में गमन, आगमन का त्याग कर देते हैं। उन दिनों में जो मुनिराज रात-दिन के किसी पदार्थ के ग्रहण करने या रखने आदि के द्वारा, यत्नाचारपूर्वक इस अहिंसा महाव्रतरूपी उत्तम व्रत का पालन करते हैं, उनके अन्य समस्त व्रत बहुत ही शीघ्र पूर्ण हो जाते हैं।
यदि कश्चिद्ददो दत्ते मृत्यर्थं कस्यचिन्महीम्।
सर्वां रत्नादिपूर्णां स तथापीच्छति नो मृतिम् ॥११३॥
अतो विश्वाङ्गिनां लोकेऽभयदानात्परान्न च।
विद्यते परमं दानं वृथा दानं दयां विना ॥११४॥
अर्थ (श्लोक 113 से 114): यदि किसी से यह कहा जाये कि हम तुझे समस्त रत्नों से परिपूर्ण इस समस्त पृथ्वी को देते हैं, इसके बदले तू मर जा परन्तु इतने पर भी कोई मरने की इच्छा नहीं करता, इसलिए कहना चाहिए कि इस संसार में समस्त जीवों को अभयदान से बढ़कर और कोई दान नहीं है। यह अभयदान सबसे उत्कृष्ट दान है। दया के बिना, अन्य दान सब व्यर्थ है।
हिंसैव पञ्चपापानां परं पापं निगद्यते।
विश्वदुःखाकरीभूता श्वभ्रद्वारि-प्रतोलिका ॥११५॥
अर्थ: पाँचों पापों में यह हिंसा ही सबसे बड़ा पाप कहा जाता है। यह हिंसा समस्त दुःखों की खान है और नरक के द्वार की गली है।
ये केचिद् दुःसहा रोगाः सर्वदुःखविधायिनः।
तेऽखिला निर्दयानां च जायन्तेऽत्राधयोऽशुभात् ॥११६॥
अर्थ: इस संसार में समस्त दुःखों को देने वाले जितने भी कठिन रोग हैं वे सब निर्दयी जीवों के ही होते हैं तथा इसी निर्दयता के पाप से मानसिक व्याधियाँ भी होती हैं।
दुर्गतिर्जीवघातेन सद्गतिर्जीवरक्षणात्।
देहिनां च विदित्वेति यदिष्टं तत्त्वमाचर ॥११७॥
अर्थ: इस संसार में जीवों को, जीवों का घात करने से दुर्गति प्राप्त होती है तथा जीवों की रक्षा करने से उत्तम गति प्राप्त होती है। यही समझकर हे जीव ! जो तुझे अच्छा लगे सो कर।
अहिंसा महाव्रत की ५ भावना
एषणासमितिश्चित्तगुप्तीर्यासमिती परे।
तथैवादाननिक्षेपणाख्यासमितिरुत्तमा ॥११८॥
दृशालोकितपानादि-भोजनं पञ्चभावनाः।
इत्यार्या भावयन्त्वाद्यव्रतस्थैर्यार्थमन्वहम् ॥११९॥
अर्थ (श्लोक 118 से 119): (१) एषणासमिति (२) मनोगुप्ति (३) ईर्यासमिति (४) आदाननिक्षेपण समिति (५) आलोकित पान-भोजन; ये पाँच इस अहिंसा व्रत की भावनाएँ हैं। इस अहिंसा महाव्रत को स्थिर रखने के लिए, मुनियों को प्रतिदिन इन भावनाओं का चिंतन करना चाहिए।
भावितं भावनाभिः प्रथमं सारं महाव्रतं।
प्रारोहति परां कोटिं शुद्धिं मुक्तिकरं सताम् ॥१२०॥
अर्थ: सज्जनों को मोक्ष प्रदान करने वाली और सारभूत यह अहिंसा महाव्रत इन भावनाओं के चिंतन करने से सर्वोत्तम शुद्धता को प्राप्त होता है।
अहिंसा व्रत की सार्थकता उपसंहार रूप में
असमगुणनिधानं स्वर्गमोक्षैकहेतुम्।
व्रतसकलसुमूलं तीर्थनाथैर्निषेव्यम्॥
अभयकरमपापं सर्वयत्नेन दक्षाः।
भजत शिवसुखाप्त्यै ह्यादिमं सद्व्रतं भोः ॥१२१॥
अर्थ: यह अहिंसा महाव्रत सर्वोत्तम गुणों का निधान है, स्वर्ग, मोक्ष का कारण है, समस्त व्रतों का मूल है, भगवान् तीर्थंकर परमदेव के द्वारा भी सेवन करने योग्य है तथा समस्त जीवों को अभय देने वाला है और पापों से सर्वथा रहित है। इसलिए हे चतुर पुरुषो! मोक्षसुख प्राप्त करने के लिए, सब तरह के प्रयत्न करके इस महाव्रत का पालन करो।
द्वितीय सत्य महाव्रत का वर्णन
तथ्यं हितं मितं सारं जिनसूत्रानुगं शुभम्।
निष्पापं करुणाक्रान्तं ब्रूयते यन्मुनीश्वरैः ॥१२२॥
धर्मज्ञानोपदेशाय रागद्वेषादिदूरगम्।
वचनं श्रीजिनैः प्रोक्तं तद्द्वितीयं महाव्रतम् ॥१२३॥
अर्थ (श्लोक 122 से 123): मुनिराज जो धर्म और ज्ञान के उपदेश के लिए रागद्वेष रहित, यथार्थ हित करने वाले, परिमित, सारभूत, जिनशास्त्रों के अनुसार शुभ, पाप रहित और करुणा से भरे हुए जो वचन कहते हैं, उसको भगवान् जिनेन्द्रदेव दूसरा सत्य महाव्रत कहते हैं।
वचः सत्यमसत्यं चोभयं ह्यनुभयं परम्।
चतुर्धेति गणाधीशैरुक्तं वचनमञ्जसा ॥१२४॥
अर्थ: भगवान् गणधर देवों ने वचन के चार भेद बतलाए हैं-(१) सत्यवचन (२) असत्यवचन (३) उभयवचन और (४) अनुभयवचन।
असत्योभयनामाऽत्र द्विधा वाक्यं शुभातिगम्।
सर्वपापकरं त्याज्यं दूरतो व्रतकांक्षिभिः ॥१२५॥
अर्थ: इनमें से (१) असत्य और (२) उभय दोनों प्रकार के वचन अशुभ हैं और समस्त पापों के करने वाले हैं इसलिए व्रत धारण करने की इच्छा करने वालों को इन दोनों को दूर से ही त्याग देना चाहिए।
सत्यानुभयसद्वाणी जगच्छर्मविधायिनी।
निष्पापा धर्मदा वाच्या सारा धर्माय योगिभिः ॥१२६॥
अर्थ: सत्य और अनुभय वचन संसार का कल्याण करने वाले हैं, पापरहित हैं, धर्म की वृद्धि करने वाले हैं, कहने योग्य हैं और सारभूत हैं इसलिए मुनियों को ये ही दो प्रकार के वचन कहने चाहिए।
प्रियं हितं वचः किञ्चित्परं किञ्चिद्धिताप्रियं।
अप्रियाहितमेवान्यच्चतुर्थेति वचो नृणाम् ॥१२७॥
अर्थ: कोई वचन प्रिय होकर भी हित करने वाले होते हैं, कोई हित करने वाले होकर भी अप्रिय होते हैं तथा कोई प्रिय भी नहीं होते और हित करने वाले भी नहीं होते, इन तीनों के अतिरिक्त जो वचन हैं वे सब चौथे भेद में शामिल हैं।
अप्रियाहितमेवैकं स्वान्ययोः पापदुःखदम्।
यत्नेन परिहर्त्तव्यं संयतैर्धर्मसिद्धये ॥१२८॥
अर्थ: इनमें से अप्रिय और अहित करने वाले वचन अपने और दूसरे दोनों को दुःख देने वाले हैं तथा पाप उत्पन्न करने वाले हैं, इसलिए मुनियों को धर्म की सिद्धि के लिए ऐसे वचन बोलने का प्रयत्नपूर्वक त्याग कर देना चाहिए।
क्वचिद् धर्मवशाद् ग्राह्यं हिताप्रियं महात्मभिः।
वचनं धर्मसिद्ध्यर्थं विपाके केवलं हितम् ॥१२९॥
अर्थ: महात्मा लोग कभी-कभी धर्म के निमित्त से होने वाले हितकारी किन्तु अप्रिय वचनों को धर्म की सिद्धि करने वाले और ग्रहण करने योग्य समझते हैं क्योंकि ऐसे वचनों का अंतिम फल आत्मा का हित ही होता है।
हितं प्रियं च वक्तव्यं वचः सर्वार्थसिद्धये।
प्रस्पष्टं निर्मलं दक्षैर्धर्मोपदेशनाय च ॥१३०॥
अर्थ: चतुर पुरुषों को समस्त पदार्थों की सिद्धि के लिए और धर्म का उपदेश देने के लिए, निर्मल और स्पष्ट ऐसे हितकारी प्रिय वचन ही कहने चाहिए।
चौरस्य चौर एवायं ह्यन्धस्यान्धोऽत्र पापिनः।
पापी षंडस्य षंडो रंडाया रंडेति दुर्वचः ॥१३१॥
अर्थ: चोर को चोर कहना, अंधे को अंधा कहना, पापी को पापी कहना, नपुंसक को नपुंसक कहना और रांड को रांड कहना ‘दुर्वचन’ कहलाते हैं।
सत्यं चापि न वक्तव्यं परक्रोधादिकारणम्।
निष्ठुरं कटुकं निन्द्यं वचः पीडाकरं नृणाम् ॥१३२॥
अर्थ: यद्यपि ये वचन सत्य हैं तथापि दूसरों को क्रोध उत्पन्न करने वाले हैं, इसलिए ऐसे वचन कभी नहीं कहने चाहिए, इनके अतिरिक्त कठोर, कड़वे, निंदनीय और मनुष्यों को दुःख उत्पन्न करने वाले वचन भी कभी नहीं कहने चाहिए।
वचसा येन जायेत बाधा पीडा च देहिनाम्।
तत्सत्यमपि लोकेऽस्मिन् न सत्यं गदितं बुधैः ॥१३३॥
अर्थ: जिन वचनों से जीवों को पीड़ा या बाधा पहुँचती हो, ऐसे वचन यद्यपि सत्य हों तथापि बुद्धिमान् लोग इस संसार में ऐसे वचनों को ‘सत्य’ कभी नहीं कहते।
जीवरक्षा हिताद्यर्थं वचो ब्रूतं क्वचिद् बुधैः।
असत्यमपि सत्यं स्यात् परार्थेन शुभप्रदम् ॥१३४॥
अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्यों को जीवों की रक्षा और किसी आत्मा का हित करने के लिए कभी-कभी ‘असत्य वचन’ भी कहने पड़ते हैं परन्तु ऐसे असत्य वचन दूसरे का कल्याण करने के कारण सत्य और शुभप्रद या कल्याण करने वाले ही माने जाते हैं।
येन संताप्यते लोकः क्रोधलोभादयोऽखिलाः।
वधबन्धान्यपीडाद्याः स्मरादीन्द्रियविक्रियाः ॥१३५॥
जायन्ते चोत्कटाः पुंसां जातु वाच्यं न तद्वचः।
रागद्वेषमदोन्मादैः प्राणनाशोऽपि संयतैः ॥१३६॥
अर्थ (श्लोक 135 से 136): जिन वचनों से लोगों को संताप हो, क्रोध, लोभादि विकार उत्पन्न हो, वध, बंध या दूसरों को पीड़ा हो, काम आदि इन्द्रियों के विकार उत्पन्न हो, तीव्रता बढ़ जाये ऐसे राग, द्वेष, मद और उन्माद से उत्पन्न होने वाले वचन कभी नहीं कहने चाहिए। मुनियों को अपने प्राण नष्ट होने पर भी ऐसे वचन कभी नहीं कहने चाहिए।
स्थिरं जायेत वैराग्यं वर्द्धन्ते सद्गुणाः सताम्।
विलीयन्ते च रागाद्याः साम्यन्त्यत्र स्मरादयः ॥१३७॥
दुर्ध्यानानि च येनाशु शुभो भावोऽस्ति धीधनैः।
वक्तव्यं तद्वचो मिष्टं धर्मतत्त्वादिदर्शकम् ॥१३८॥
अर्थ (श्लोक 137 से 138): जिन वचनों से वैराग्य की स्थिरता हो, सज्जनों के गुण वृद्धि को प्राप्त होते रहें, राग, द्वेष आदि नष्ट हो जाये, कामादिक विकार तथा आर्त, रौद्र ध्यान नष्ट हो जाये तथा जिन वचनों से शुभ शीघ्र भाव प्रकट हो जाये, जो वचन मिष्ट हों और धर्म या तत्त्वों का उपदेश देने वाले हों, ऐसे ही वचन, बुद्धिमानों को बोलने चाहिए।
उक्तेनानेन मेऽन्येषां शुभं किंवाऽशुभं भवेत्।
यशोऽथवाऽयशः स्वास्थ्यं श्रेयोऽश्रेयोऽथ संप्रति ॥१३९॥
पूर्वं चित्ते विचार्येति पश्चाद्वदन्तु योगिनः।
शश्वद्धर्मोपदेशाय स्वागमानिन्दितं वचः ॥१४०॥
अर्थ (श्लोक 139 से 140): मुनियों को बोलने के पहले यह विचार कर लेना चाहिए कि इन वचनों के कहने से मेरा या दूसरे का शुभ होगा या अशुभ होगा, यश होगा या अपयश होगा तथा कल्याण होगा या अकल्याण होगा, यह सब विचार कर, मुनियों को बोलना चाहिए तथा निरन्तर धर्मोपदेश देने के लिए अपने आगम के अनुसार, अनिन्दित वचन ही कहने चाहिए।
नो चेन्मौनं प्रकुर्वन्तु सारं सर्वार्थसिद्धिदम्।
धर्मशुक्लाऽऽगमात्मज्ञाः सर्वदोषापहं परम् ॥१४१॥
अर्थ: यदि ऐसे वचन (आगमानुकूल वचन) कहने का समय न हो तो धर्मध्यान, शुक्लध्यान और आगम को जानने वाले मुनियों को समस्त दोषों को दूर करने वाला, समस्त पदार्थों की सिद्धि करने वाला, सर्वोत्कृष्ट और सारभूत मौन धारण कर लेना चाहिए।
सत्येन वचसा कीर्तिः परमा शशिनिर्मला।
भ्रमेल्लोकत्रये सर्वे वर्द्धन्ते सद्गुणाः सताम् ॥१४२॥
अर्थ: सत्य वचन कहने से सर्वोत्कृष्ट और चंद्रमा के समान निर्मल कीर्ति, तीनों लोकों में भर जाती है तथा सज्जनों के समस्त श्रेष्ठ गुण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं।
सत्यमन्त्रेण योग्यं वा भारती विश्वदीपिका।
सद्बुद्ध्याऽवतरत्येवामा मुखे सत्यवादिनां ॥१४३॥
अर्थ: इस सत्यरूपी मंत्र के प्रभाव से संसार के समस्त पदार्थों को दिखलाने वाली सरस्वती श्रेष्ठ बुद्धि के साथ-साथ सत्यवादियों के मुख में ही आकर अवतार लेती है, सो योग्य ही है।
सम्पद्यते पराबुद्धिर्निकषग्राव-सन्निभा।
विश्वतत्त्वपरीक्षायां सुधियां सत्यवाक्यतः ॥१४४॥
अर्थ: इस सत्यवचन के प्रभाव से बुद्धिमान् पुरुषों की श्रेष्ठ बुद्धि, समस्त तत्त्वों की परीक्षा करने के लिए कसौटी के समान हो जाती है।
वाक्येन मधुरेणाऽत्र तुष्यन्ति प्राणिनो यथा।
न तथा वस्तुदानाद्यैर्वाक्येऽहो का दरिद्रता ॥१४५॥
अर्थ: इस संसार के प्राणी, जिस प्रकार मधुर वचनों से संतुष्ट होते हैं, उस प्रकार अन्य पदार्थों के देने से सन्तुष्ट नहीं होते, इसलिए वचनों से कभी दरिद्रता नहीं रखनी चाहिए।
मत्वेति मधुरं वाक्यं हितं कर्णसुखावहम्।
कटुकं निष्ठुरं त्यक्त्वा वक्तव्यं धर्मसिद्धये ॥१४६॥
अर्थ: यही समझकर, धर्म की सिद्धि के लिए, कठोर और कड़वे वचनों का त्याग कर, मधुर एवं हित करने वाले और कानों को सुख देने वाले वचन कहने चाहिए।
सत्ये च मधुरे वाक्ये जगत्पूज्ये शुभाकरे।
त्यक्त्वासत्यं जगन्निन्द्यं वदेत्कः कटुकं सुधीः ॥१४७॥
अर्थ: सत्य और मधुर वचन जगत्पूज्य हैं और शुभ की खान हैं, फिर भला ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो ऐसे वचनों को छोड़कर असत्य, जगत् में निंद्य और कड़वे वचनों को कहेगा अर्थात् कोई नहीं।
इन्द्रादयो न प्रत्यूहं कर्तुं शक्ताश्च धीमताम्।
खादन्ति क्रूरसर्पाद्याः सत्यसीमावलंबिनाम् ॥१४८॥
अर्थ: सत्य की मर्यादा वाले वचन कहने वाले, बुद्धिमानों के कार्यों में, इन्द्र भी कोई विघ्न नहीं कर सकता तथा क्रूर सर्पादिक भी उसे नहीं काट सकते।
अग्नयो न दहन्त्यत्र, नागाः खादंति जातु न।
सुसत्यवादिनो लोके, प्रत्यक्षेणेति दृश्यते ॥१४९॥
अर्थ: इस संसार में यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि सत्यवादी लोगों को न तो अग्नि जलाती है और न सर्प ही काटते हैं।
असत्यवादिनस्तेऽपि न सहन्तेऽनलादयः।
मुखरोगादयः सर्वे जायन्तेऽनृतभाषिणाम् ॥१५०॥
अर्थ: वे अग्नि, सर्प आदि असत्यवादियों को कभी सहन नहीं कर सकते, असत्यवादियों को मुखरोग या कुष्ठ आदि समस्त रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
मृषावादोत्थपापेन मूर्खता जायते नृणाम्।
हीयते परमा बुद्धिरकीर्तिः स्याज्जगत्त्रये ॥१५१॥
अर्थ: मिथ्या भाषण से उत्पन्न हुए पाप के द्वारा मनुष्यों में मूर्खता उत्पन्न होती है, श्रेष्ठ बुद्धि भी नष्ट हो जाती है और तीनों लोकों में अपकीर्ति फैल जाती है।
गूथभक्षणमेवाहो वरं वा विषभक्षणम्।
नासत्यभाषणं धर्मविरोधि वाऽशुभाकरम् ॥१५२॥
अर्थ: यह असत्य भाषण, धर्म का विरोधी है और दुर्गतिर्यों को देने वाला है, इसलिए विष खा लेना अच्छा अथवा विष्ठा खा लेना अच्छा परन्तु असत्य भाषण करना अच्छा नहीं।
चिरप्रव्रजितो योगी महाश्रुततपोङ्कितः।
यः सोप्यत्र मृषावादान् निन्द्यः स्यादन्त्यजादपि ॥१५३॥
अर्थ: जो मुनि चिरकाल का दीक्षित है, महाश्रुतज्ञानी है तथा महातपस्वी है, वह भी असत्य भाषण करने से चांडाल से भी निंद्य समझा जाता है।
विज्ञायेति न वक्तव्यं क्वचिच्च वितथं वचः।
परपीडाकरं दक्षैः सत्सु कार्यादिकोटिषु ॥१५४॥
अर्थ: यही समझकर करोड़ों श्रेष्ठ और अच्छे कार्य होने पर भी, चतुर पुरुषों को पीड़ा उत्पन्न करने वाले, असत्य वचन कभी नहीं कहने चाहिए।
अनिष्टं यद्भवेद्वाक्यं परुषं कर्णदुःखदम्।
न वाच्यं तत्परस्यैतन्मूलं धर्मव्रतात्मनाम् ॥१५५॥
अर्थ: जो वचन दूसरों को अनिष्ट हों, जो कठोर हों और कानों को दुःख देने वाले हों, ऐसे वचन धर्मात्मा और व्रती पुरुषों को कभी नहीं कहने चाहिए।
मौन की उपयोगिता
मौनमेवोचितं सारं सर्वास्त्रवनिरोधकम्।
मुनीनामथवा जाते कार्ये धर्मनिबन्धिनि ॥१५६॥
वदन्तु मुनयः सत्यं मितं स्वल्पाक्षरं शुभम्।
बह्वर्थं धर्मसंसिद्ध्यै व्यक्तं चागमसंभवम् ॥१५७॥
अर्थ (श्लोक 156 से 157): प्रायः मुनियों को मौन धारण करना चाहिए, यह मौन ही समस्त आस्रव को रोकने वाला है और सारभूत है। यदि किसी धर्मकार्य के लिए बोलना पड़े तो मुनियों को धर्म की सिद्धि के लिए सत्य, परिमित, शुभ, थोड़े से अक्षरों में बहुत से अर्थ को सूचित करने वाला, व्यक्त और आगम के अनुकूल बोलना चाहिए।
सत्य महाव्रत की ५ भावना
क्रोधलोभभयत्यागाः हास्यवर्जनमेव च।
सामस्त्येन विचार्योच्चैरागमोक्तसुभाषणम् ॥१५८॥
इमाः सद्भावनाः पञ्च भावयन्तु तपोधनाः।
सत्यव्रतविशुद्ध्यर्थं प्रत्यहं व्रतकारिणीः ॥१५९॥
अर्थ (श्लोक 158 से 159): (१) क्रोध का त्याग (२) लोभ का त्याग (३) भय का त्याग (४) हास्य का त्याग और (५) सब बातों का विचार कर आगम के अनुसार भाषण करना; ये पाँच इस सत्य महाव्रत की भावना हैं। ये भावना ही व्रतों को स्थिर रखती हैं, इसलिए मुनियों को अपना सत्यव्रत विशुद्ध रखने के लिए प्रतिदिन इन भावनाओं का चिंतन करते रहना चाहिए।
श्रुतसकलविधातारं महाधर्मबीजम्,
शिवसुरगतिहेतुं विश्वकीर्त्यादिखानिम्।
दुरिततिमिरभानुं सर्वकल्याणमूलम्,
इदमपगतदोषाः सद्व्रतं पालयन्तु ॥१६०॥
अर्थ: यह सत्य महाव्रत समस्त श्रुतज्ञान को देने वाला है, धर्म का श्रेष्ठ बीज है, मोक्ष तथा स्वर्ग गति का कारण है, संसार भर में कीर्ति को फैलाने वाला है, पापरूपी अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य के समान है, समस्त कल्याणों का मूल है, अतएव समस्त दोषों से रहित मुनियों को इसका पालन करना चाहिए।
ग्रामखेटाटवीशैल - गृहारण्यपथादिषु।
पतितं विस्मृतं नष्टं स्थापितं वान्यवस्तु च ॥१६१॥
सूक्ष्मं स्थूलं महद्वाल्पं गृह्यते यन्न जातुचित्।
कृष्णाहिरिव विज्ञेयं तत् तृतीयं महाव्रतम् ॥१६२॥
अर्थ (श्लोक 161 से 162): किसी गाँव, खेट, वन, पर्वत, घर, जंगल वा मार्ग आदि में पड़ी हुई, भूली हुई, खोई हुई या रखी हुई, छोटी, बड़ी, बहुत वा कम दूसरे की वस्तु को कभी ग्रहण नहीं करना है। उससे काले सर्प के समान समझकर अलग हट जाना है, उसको तीसरा ‘अचौर्य महाव्रत’ कहते हैं।
अहो! ये मुनयो वन्द्याः निर्लोभाः स्वतनावपि।
दत्तं जातु न गृह्णन्ति श्रामण्यायोग्यमेव यत् ॥१६३॥
कथं गृह्णन्ति ते निन्द्यं परस्वं श्वभ्रकारणम्।
अदत्तं स्वान्ययोर्घोरं-दुःखक्लेशाशुभादिदम् ॥१६४॥
अर्थ (श्लोक 163 से 164): देखो! जो मुनि वंदनीय हैं, जो अपने शरीर में भी लोभ या ममत्व नहीं रखते, जो मुनियों के अयोग्य पदार्थों को देने पर भी ग्रहण नहीं करते, वे भला दूसरे के द्वारा बिना दिए हुए निंदनीय परधन को कैसे ग्रहण कर लेंगे क्योंकि बिना दिया हुआ दूसरे का धन, नरक का कारण है तथा अपने और दूसरों के लिए घोर दुःख, घोर क्लेश और अनेक दुर्गतियों को देने वाला है।
अदत्तादानदोषेण बन्धवधादयो नृपात्।
लभ्यन्तेऽत्रैव चौरैश्च परत्र नरकादयः ॥१६५॥
अर्थ: बिना दिए हुए धन को ग्रहण करने के दोष से चोरों को राजा से इसी लोक में अनेक प्रकार के वध, बंधन आदि के दुःख प्राप्त होते हैं तथा परलोक में नरकादि दुर्गतियाँ प्राप्त होती हैं।
क्षणमात्रं न चेह्यन्ते संसर्गं तस्करस्य भोः।
यतयः स्वजना वाऽत्र वध-बन्धादिशङ्कया ॥१६६॥
अर्थ: हे मुनिराज ! देखो चोर के कुटुम्बी लोग भी वध, बंधन आदि की आशंका से क्षण भर भी चोर का संसर्ग नहीं चाहते।
अदत्तादानमात्रेण कलङ्कं दुस्त्यजं भुवि।
जायते प्राणसन्देहः कुलस्य दुर्धियां क्षणात् ॥१६७॥
अर्थ: बिना दिए हुए धन को ग्रहण करने मात्र से इस संसार में कभी न छूटने वाला कलंक लग जाता है तथा वह कलंक उन मूर्खों के समस्त कुल में लग जाता है और क्षण भर में ही उनके प्राणों में संदेह हो जाता है।
अर्हतां याष्टधा पूजा केनचिद्धीमता कृता।
तामादत्तेऽत्र यो लुब्धो महाचौरः स कथ्यते ॥१६८॥
अर्थ: किसी भी बुद्धिमान् के द्वारा, जो अष्टद्रव्य से भगवान् अरहंतदेव की पूजा की जाती है, उस चढ़ी हुई पूजा के द्रव्य को जो ग्रहण करता है, उसे भी लोभी और महाचोर समझना चाहिए।
श्रीजिनेन्द्रमुखोत्पन्ने शास्त्रे केनापि पूजिते।
तत्पूजावस्तु नादेयं जात्वचौर्यव्रताप्तये ॥१६९॥
अर्थ: जिस किसी भी पुरुष ने भगवान् जिनेन्द्रदेव के मुख से उत्पन्न हुई सरस्वती की पूजा की है और उसमें जो द्रव्य चढ़ाया है, वह भी अचौर्य व्रत पालन करने के लिए कभी नहीं लेना चाहिए।
रत्नत्रयं समुच्चार्य गुरुपादौ प्रपूजितौ।
अर्चया सा न चादेया सद्द्रव्या जातुचिज्जनैः ॥१७०॥
अर्थ: जिस द्रव्य से रत्नत्रय का उच्चारण करते हुए आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की पूजा की है, वह द्रव्य भी सज्जनों को कभी नहीं लेना चाहिए।
किमत्र बहुनोक्तेन निर्माल्यं दुरिताकरम्।
देवशास्त्रगुरूणां च नादेयं धर्मकांक्षिभिः ॥१७१॥
अर्थ: बहुत कहने से क्या लाभ है थोड़े से में इतना समझ लेना चाहिए कि देव-शास्त्र-गुरुओं पर चढ़ाया हुआ निर्माल्य द्रव्य धर्मात्मा पुरुषों को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि उसको ग्रहण करने से अनेक प्रकार के पाप उत्पन्न होते हैं।
यदि स्वर्गं व्रजेत् पूजा कर्त्ताऽर्हद्ज्ञानयोगिनाम्।
तन्निर्माल्यत्तचित्तानां श्वभ्रं केन निवार्यते ॥१७२॥
अर्थ: यदि देव-शास्त्र-गुरु की पूजा करने वाला स्वर्ग को जाता है तो उस निर्माल्य द्रव्य को ग्रहण करने वाले को नरक में जाने से कौन रोक सकता है अर्थात् कोई नहीं।
अदत्तमथवा दत्तं यत्संयमादिहानिकृत्।
तत् सर्वथा न च ग्राह्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥१७३॥
अर्थ: जो द्रव्य दिया हो या न दिया हो, यदि वह संयम की हानि करने वाला है तो कंठगत प्राण होने पर भी मुनियों को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए।
इति मत्वा न चादेयं संयतैर्दन्तशुद्धये।
अदत्तं तृणमात्रं भोः का कथा परवस्तुषु ॥१७४॥
अर्थ: यही समझकर मुनियों को अपने दाँत, शुद्ध करने के लिए बिना दिया हुआ तृण भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, फिर भला पर पदार्थों की तो बात ही क्या है।
अचौर्यव्रत की सफलता
परस्वं ये न गृह्णन्ति ग्राहयन्ति न जातुचित्।
गृह्णन्तं नानुमन्यन्तेऽत्राणुमात्रेतरं बुधाः ॥१७५॥
कालाहिमिव कायेन वचसा मनसा भुवि।
संपूर्ण जायते तेषां ज्ञानिनां तन्महाव्रतम् ॥१७६॥
अर्थ (श्लोक 175 से 176): जो बुद्धिमान् पुरुष अणुमात्र या बहुत-सी पर वस्तु को काले सर्प के समान समझकर, मन-वचन-काय से न तो स्वयं ग्रहण करते हैं, न कभी दूसरों से ग्रहण कराते हैं और न कभी ग्रहण करने वाले की अनुमोदना ही करते हैं, उन ज्ञानी पुरुषों के इस संसार में तीसरा अचौर्य महाव्रत पूर्ण प्रकट होता है।
अचौर्यव्रत की ५ भावना
याच्ञाख्या समनुज्ञापना नात्मभाव एव हि।
तथैव निरवद्यं प्रतिसेवनं सुभावना ॥१७७॥
साधर्म्युपकरणस्यानुवीची सेवनं त्विमाः।
अस्तेयव्रतशुद्ध्यर्थं भावनीयाः सुभावनाः ॥१७८॥
अर्थ (श्लोक 177 से 178): (१) कभी किसी से याचना नहीं करना (२) किसी को कुछ आज्ञा न देना (३) किसी भी पदार्थ से ममत्व नहीं रखना (४) सदा निर्दोष पदार्थ का सेवन करना (५) और साधर्मी पुरुषों के साथ शास्त्रानुकूल बर्ताव करना ये पाँच अचौर्य महाव्रत को शुद्ध रखने वाली श्रेष्ठ भावनाएँ हैं।
अखिलविभवहेतुं लोभमातङ्गसिंहम्।
शिवशुभगतिमार्गं सारमस्तेयसङ्गम्॥
व्रतवरमपदोषं मुक्तिकामाः शिवाप्त्यै।
भजत परमयत्नाल्लोभशत्रुं निहत्य ॥१७९॥
अर्थ: यह अचौर्य महाव्रत, समस्त विभूतियों का कारण है, लोभ रूपी हाथी को मारने के लिए सिंह के समान है, मोक्ष और शुभगति का मार्ग है, समस्त व्रतों में सार है, सब व्रतों में उत्तम है और समस्त दोषों से रहित है, इसलिए मोक्ष की इच्छा करने वाले को लोभरूपी शत्रु को मारकर बड़े प्रयत्न से, केवल मोक्ष प्राप्त करने के लिए, इस महाव्रत का पालन करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य महाव्रत का स्वरूप
स्वात्मजेव सुकन्यां यौवनस्था भगिनीव च।
वृद्धा नारी निजाम्बेव दृश्यते या विरागिभिः ॥८०॥
अर्थ (श्लोक 80 से 81): शुद्ध हृदय को धारण करने वाले, वीतरागी पुरुष अपने रागरूप परिणामों का सर्वथा त्यागकर कन्या को अपनी पुत्री के समान मानते हैं। यौवनवती स्त्री को अपनी भगिनी के समान मानते हैं और वृद्धा स्त्री को अपनी माता के समान मानते हैं, इस प्रकार जो निर्मल ब्रह्मचर्य को धारण करते हैं उसको भगवान् जिनेन्द्रदेव ‘ब्रह्मचर्य महाव्रत’ कहते हैं।
सरागपरिणामादीन् त्यक्त्वा शुद्धाशयैः सदा।
निर्मलं तज्जिनैः प्रोक्तं ब्रह्मचर्य-महाव्रतं ॥१८०॥
नवधेति विकल्पाः स्युरब्रह्महेतवोऽखिलान्।
परिहृत्य त्रिशुद्ध्या तान् नवधा ब्रह्म रक्ष्यते ॥१८१॥
अर्थ: संसार में (१) मनुष्यनी (२) तिर्यंचनी और (३) देवी ये तीन प्रकार की स्त्रियाँ हैं, यदि इन तीनों को मन, वचन, काय इन तीनों से सेवन करने की इच्छा की जाये तो ‘अब्रह्मचर्य’ के ९ भेद हो जाते हैं, इसलिए मन, वचन, काय की शुद्धतापूर्वक इन सबका त्याग कर नौ प्रकार के ब्रह्मचर्य की रक्षा करनी चाहिए।
सर्वथा वाङ्मनः कायान् कृतादीनि निरुध्य च।
नवधा ब्रह्मचर्यं हि पालयन्तु जितेन्द्रियाः ॥१८२॥
अर्थ: अथवा मन-वचन-काय और कृत-कारित-अनुमोदना को सर्वथा रोककर, जितेन्द्रिय पुरुषों को ९ प्रकार से पूर्ण ब्रह्मचर्य को पालना चाहिए क्योंकि प्रत्येक स्त्री के संबंध से ९ भेद हो सकते हैं।
स्त्रीशृङ्गारकथालापाः कामोद्रेकनिबन्धनाः।
न श्रोतव्या न कर्त्तव्यास्त्रिशुद्ध्या ब्रह्मचारिभिः ॥१८६॥
अर्थ: स्त्रियों के शृंगार की कथा कहना भी कामोद्रेक का कारण है इसलिए ब्रह्मचारियों को अपने मन-वचन-काय को शुद्ध रखकर स्त्रियों के शृंगार की कथा न कभी सुननी चाहिए और न कभी कहनी चाहिए।
विलासहास - शृङ्गारगीतनृत्यकलादिकान्।
योषितां नैव पश्यन्ति बहून् रागकरान् बुधाः ॥१८७॥
अर्थ: स्त्रियों के विलास, हास, शृंगार, गीत, नृत्य, कला आदि सब बहुत ही राग उत्पन्न करने वाले हैं, इसलिए बुद्धिमान् लोग इनको कभी नहीं देखते हैं।
क्षणमात्रं न कर्त्तव्यं संसर्गं योषितां क्वचित्।
कलङ्ककारणं निन्द्यं ब्रह्मचर्यपरायणैः ॥१८८॥
अर्थ: स्त्रियों का संसर्ग कलंक लगाने वाला, अत्यन्त निंद्य है इसलिए ब्रह्मचारी पुरुषों को, स्त्रियों का संसर्ग क्षणमात्र भी कभी नहीं करना चाहिए।
यतः संसर्गमात्रेण स्त्रीणां संजायते सताम्।
कलङ्कं दुस्त्यजं लोके प्राणसन्देह एव च ॥१८९॥
अर्थ: इसका भी कारण यह है कि इस संसार में स्त्रियों का संसर्ग करने मात्र से सज्जन पुरुषों को कभी भी न छूटने वाला कलंक लग जाता है तथा उनके प्राणों में भी संदेह हो जाता है।
चित्रादिनिर्मिता नारी मनः क्षोभं करोति भोः।
साक्षात्पुंसां सुरूपा स्त्री किमनर्थं करोति न ॥१९०॥
अर्थ: अरे! देखो चित्र की बनी हुई स्त्री भी पुरुषों के मन में क्षोभ उत्पन्न कर देती है फिर भला, अत्यन्त रूपवती साक्षात् स्त्री क्या-क्या अनर्थ नहीं कर सकती? अर्थात् सब कुछ कर सकती है।
नवनीतनिभं चित्तं ह्यग्निज्वलोपमाङ्गनाम्।
किं नाकृत्यं नृणां कुर्यात्तयोः संसर्ग एव च ॥१९१॥
अर्थ: पुरुष का हृदय मक्खन के समान है और स्त्री का हृदय अग्नि की ज्वाला के समान है, फिर भला, इन दोनों का संसर्ग क्या-क्या अनर्थ नहीं कर सकता अर्थात् सब तरह के अनर्थ कर सकता है।
वरं व्याघ्राहिचौराणां संसर्गः प्राणनाशकृत्।
न च स्त्रीणां जगन्निन्द्यो व्रतघ्नो नरकप्रदः ॥१९२॥
अर्थ: सिंह, सर्प और चोर आदि का संसर्ग यद्यपि प्राणों का नाश करने वाला है तथापि वह तो श्रेष्ठ है, परन्तु संसार भर में निंदनीय, व्रतों को नाश करने वाला और नरक में धकेलने वाला स्त्रियों का संसर्ग कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता।
नारीसंसर्गमात्रेण बहवो योगिनो भुवि।
नष्टाः श्वभ्रं गताः केचिच्छूयन्ते श्रीजिनागमे ॥१९३॥
अर्थ: भगवान् जिनेन्द्रदेव के आगम से जाना जाता है कि इस संसार में स्त्रियों का संसर्ग करने मात्र से अनेक योगी नष्ट हो गये हैं और कितने ही योगी नरक में पहुँचे हैं।
मत्वेति सर्वयत्नेन संसर्गोऽनर्थकृद्बुधैः।
त्याज्यः स्त्रीणां च सर्वासां कलङ्कश्शङ्कया तराम् ॥१९४॥
अर्थ: यही समझकर, बुद्धिमान् पुरुषों को कलंक लगने की शंका से, पूर्ण प्रयत्न के साथ, समस्त स्त्रियों का संसर्ग छोड़ देना चाहिए क्योंकि स्त्रियों का संसर्ग अनेक अनर्थ उत्पन्न करने वाला है।
न केवलं बुधैस्त्याज्यः संसर्गो योषितामिह।
किन्तु निःशीलपुंसां च सङ्गो लोकद्वयान्तकृत् ॥१९५॥
अर्थ: बुद्धिमान् पुरुषों का कार्य, केवल स्त्रियों के संसर्ग के त्याग करने से ही पूर्ण नहीं होता, किन्तु उन्हें शीलरहित पुरुषों के संसर्ग का भी त्याग कर देना चाहिए क्योंकि शीलरहित पुरुषों का संसर्ग भी दोनों लोकों को नाश करने वाला है।
ब्रह्मचर्यं च सर्वेषां व्रतानां शुद्धिकारणम्।
ब्रह्मचर्यविनाशेन सर्वे नश्यन्ति सद्व्रताः ॥१९६॥
अर्थ: यह ब्रह्मचर्य, समस्त व्रतों की शुद्धि का कारण है तथा इस ब्रह्मचर्य का नाश होने से समस्त श्रेष्ठ व्रत नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्यच्युतः श्वेव, सर्वत्र चापमान्यते।
मुनिभिः स्वजनैः प्राणीहेहामुत्रातिदुःखभाक् ॥१९७॥
अर्थ: जो प्राणी ब्रह्मचर्य से च्युत हो जाता है, उसका अपमान, मुनि वा अन्य सज्जन सर्वत्र करते हैं तथा वह प्राणी इस लोक और परलोक दोनों लोकों में दुःख पाता है।
गौरचर्मावृतं कान्तं वस्त्राभरणमण्डितम्।
स्त्रीरूपं त्वं मुने वीक्ष्य तस्यान्तःस्थं विचारय ॥१९८॥
अर्थ: हे मुनिराज! गौरवर्ण के चमड़े से ढके हुए, अत्यन्त मनोहर और वस्त्राभूषणों से सुशोभित ऐसे स्त्री के रूप को देखकर, तू उसके भीतर भरे हुए पदार्थों का चिंतन कर।
अहो! घृणास्पदं निन्द्यं लालाम्बुकर्दमीकृतम्।
श्लेष्मागारं च दुर्गन्धं स्त्रीमुखं क्व प्रशस्यते ॥१९९॥
अर्थ: देखो, स्त्रियों का मुख अत्यन्त घृणित और निंदनीय है, थूक के पानी की बनी हुई कीचड़ से वह भर रहा है, कफ का वह घर है और अत्यन्त दुर्गंधमय है, भला ऐसे स्त्री के मुख की प्रशंसा कहाँ की जा सकती है अर्थात् कहीं नहीं।
मांसपिण्डौ कुचौ स्त्रीणां धातुशोणितसंभृतौ।
विष्ठादिनिचितं चास्ति पञ्जरं जठरं परम् ॥२००॥
अर्थ: और देखो, स्त्रियों के कुच मांस के पिण्ड हैं, धातु और रुधिर से भरे हुए हैं। इसी प्रकार स्त्रियों का उदर विष्ठा से भरा हुआ है और हड्डी पसलियों से परिपूर्ण हैं।
स्रवन् मूत्रादिदुर्गन्धं योनिरन्ध्रं घृणास्पदं।
श्वभ्रागारमिवासारं कथं स्याद् रतये सताम् ॥२०१॥
अर्थ: स्त्रियों की योनि से सदा रुधिर, मूत्र बहता रहता है, इसलिए वह दुर्गंधमय अत्यन्त घृणित और नरक के घर के समान असार समझी जाती है। उसमें भला सज्जन लोग कैसे अनुराग कर सकते हैं अर्थात् कभी नहीं।
सूक्ष्मा अलब्धपर्याप्ता जायन्ते मानवाः सदा।
योनौ नाभौ च कक्षायां विश्वस्त्रीणां स्तनान्तरे ॥२०२॥
अर्थ: कर्मभूमि की समस्त स्त्रियों की योनि में, नाभि में, कांख में और दोनों स्तनों के मध्य भाग में, सूक्ष्म और अलब्ध पर्याप्तक मनुष्य सदा उत्पन्न होते रहते है।
तेषु सर्वप्रदेशेषु, म्रियन्ते जन्तुराशयः।
लिङ्गहस्तादिसंस्पर्शादित्युक्तं स्वागमे जिनैः ॥२०३॥
अर्थ: उन समस्त प्रदेशों में लिंग अथवा हाथ आदि का स्पर्श होता है। उस स्पर्श से वह जीवों की राशि मर जाती है। ऐसा भगवान् जिनेन्द्रदेव ने अपने आगम में बतलाया है।
अतो मुनीश्वरैर्निन्द्यं श्वभ्रदुःखनिबन्धनम्।
सर्वपापाकरी भूतं मैथुनं स्यात्कुमार्गगम् ॥२०४॥
अर्थ: इसलिए कहना चाहिए कि यह मैथुन कर्म मुनीश्वरों के द्वारा निंदनीय है, नरक के दुःखों का कारण है, समस्त पापों की खान है और कुमार्ग में ले जाने वाला है।
कामदाहादिशान्त्यर्थं सेवन्ते येऽत्र मैथुनम्।
वृषभास्तेऽनलं दीप्तं तैलेन वारयन्ति भोः ॥२०५॥
अर्थ: जो लोग यहाँ केवल काम के संताप को शांत करने के लिए मैथुन सेवन करते हैं, उन्हें ‘बैल’ समझना चाहिए, वे लोग जलती हुई अग्नि को तेल से बुझाना चाहते हैं।
कार्यं न शयनं जातु कोमले संस्तरे क्वचित्।
आसने चासनं ब्रह्म-घातकं ब्रह्मचारिभिः ॥२०६॥
अर्थ: ब्रह्मचारियों को ‘कोमल बिछौने’ पर कभी नहीं सोना चाहिए और न कोमल आसन पर बैठना चाहिए क्योंकि ब्रह्मचारियों को कोमल आसन भी ब्रह्मचर्य का घात करने वाला है।
सर्वः शरीरसंस्कारः कामरागादिवर्धकः।
न विधेयो बुधैर्निन्द्यो ब्रह्मरक्षात्तमानसैः ॥२०७॥
अर्थ: शरीर का सब तरह का संस्कार, काम और राग को बढ़ाने वाला है तथा निंदनीय है, इसलिए ब्रह्मचर्य की रक्षा करने में जिनका मन लगा हुआ है ऐसे बुद्धिमान् पुरुषों को किसी भी प्रकार का शरीर का संस्कार नहीं करना चाहिए।