मोक्ष के प्रेमी हमने, कर्मों से लड़ते देखे।
मखमल पर सोनेवाले, भूमि पर पड़ते देखे ॥ टेक ॥
सरसों का दाना जिनके, बिस्तर पर चुभता था,
काया की सुध नाहीं, गीदड़ तन भगते देखे ॥ 1 ॥
अर्जुन और भीम जिनके, बल का न पार था,
आत्मोन्नति के कारण, अग्नि में जलते देखे ॥ 2 ॥
हे पारसनाथ स्वामी, तद्भव मोक्षगामी,
कर्मों ने नाही छोड़ा, पत्थर तक पड़ते देखे ॥ 3 ॥
बौद्धों का जोर था जब, निकलंक देव देखे,
धर्म को नाहीं छोड़ा, मस्तक तक कटते देखे ॥ 4 ॥
भोगों को त्याग चेतन, जीवन ये बीता जाये
तृष्णा न पूरी हुई, डोली पर चढ़ते देखे ॥5॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २०६