मोहि तारो जी क्यों ना, तुम तारक त्रिजग त्रिकाल में | Mohi Taro Ji Kyon Na Tum Tarak Trijag Trikal Men

मोहि तारो जी क्यों ना, तुम तारक त्रिजग त्रिकाल में

मोहि तारो जी क्यों ना, तुम तारक त्रिजग त्रिकाल में ।।टेक।।

मैं भवउदधि पर्‌यौ दुख भोग्यो, सो दुख जात कह्यौ ना ।
जामन मरन अनंततनो तुम, जानन माहिं छिप्यो ना ।।१।।मोहि. ।।

विषय विरसरस विषम भख्यो मैं, चख्यौ न ज्ञान सलोना ।
मेरी भूल मोहि दुख देवै, कर्मनिमित्त भलौ ना ।।२।।मोहि. ।।

तुम पदकंज धरे हिरदै जिन, सो भवताप तप्यौ ना ।
सुरगुरुहूके वचनकरनकर, तुम जसगगन नप्यौ ना ।।३।।मोहि. ।।

कुगुरु कुदेव कुश्रुत सेये मैं, तुम मत हृदय धर्‌यो ना ।
परम विराग ज्ञानमय तुम जाने विन काज सर्‌यौ ना ।।४।।मोहि. ।।

मो सम पतित न और दयानिधि, पतिततार तुम-सौ ना ।
‘दौलतनी’ अरदास यही है, फिर भववास वसौं ना ।।५।।मोहि. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ३६ से ३७

अर्थ

तीनों कालों में - तीनों लोकों में आप ही तारनेवाले हैं, आप मुझे क्यों नहीं तारते हैं !

मैं भवउदधि पर्यो दुख भोग्यो, सो दुख जात कह्यौ ना।

मैं इस संसार-समुद्र में पड़ा हूँ, मैंने बहुत दुःख भोगा है, जिनका अब कथन भी नहीं किया जा सकता। मैं अनन्त बार जन्म मरण कर चुका। यह सब आपके ज्ञान में है, आपसे कुछ छुपा हुआ नहीं है।

विषय विरसरस विषम भख्यो मैं, चख्यौ न ज्ञान सलोना।

मैंने विषम व विकारी रस से भरे विषयों का आस्वादन किया और करता ही रहा पर सलोने ज्ञान-विवेक का स्वाद कभी नहीं चखा। यह मेरी भूल, कर्मों का निमित्त पाकर अब मुझे ही दुःखकारी है, दुःख देनेवाली है।

तुम पदकंज धरे हिरदै जिन, सो भवताप तप्यौ ना।

जिन्होंने आपके चरण कमलों को भावपूर्वक हृदय में धारण किया, वे भव-संसार के ताप से नहीं झुलसे। वृहस्पति के वचनों के द्वारा भी आपके यशरूपी आकाश के विस्तार को मापा नहीं जा सकता।

मैंने कुगुरु, कुदेव व कुशास्त्र की सेवा की, आपके द्वारा प्रसारित धर्म को हृदय में धारण नहीं किया। परन्तु आप परम वीतरागी हैं, ज्ञानमय हैं, सर्वज्ञ हैं, यह जाने बिना मेरा काम नहीं चला। हे दयानिधि - मेरे समान कोई पापी नहीं है और पापियों का आप जैसा उद्धारक कोई नहीं है। दौलतराम की यह अरज है कि मुझे अब फिर संसार का निवास कभी प्राप्त न हो, इस संसार में रहना न हो।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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