मोहि कब ऐसा दिन आय है | Mohi kab esa din aaye hai

मोहि कब ऐसा दिन आय है
सकल विभाव अभाव होंहिंगे, विकलपता मिट जाय है ।।मोहि. ।।
यह परमातम यह मम आतम, भेद-बुद्धि न रहाय है ।
ओरनिकी का बात चलावै, भेद-विज्ञान पलाय है ।।मोहि. ।।१ ।।
जानैं आप आपमें आपा, सो व्यवहार विलाय है ।
नय-परमान-निक्षेपन-माहीं, एक न औसर पाय है ।।मोहि. ।।२ ।।
दरसन ज्ञान चरनके विकलप, कहो कहाँ ठहराय है ।
`द्यानत’ चेतन चेतन ह्वै है, पुदगल पुदगल थाय है ।।मोहि. ।।३ ।।

Artist - श्री द्यानतराय जी

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अर्थ

संसारका प्रत्येक मानव जीवनमें एक साथ रखता है। उसका एक लक्ष्य होता है और उसमें सफलता प्राप्त करनेके लिए निरन्तर उत्कंठित रहता है। उत्कंठित ही नहीं रहता है, उसमें सिद्धि पानके लिए वह इतना तन्मय हो जाता है कि प्रतिक्षण उसे अपने लक्ष्यके सिवाय अन्य कुछ भी दिखलाई नहीं देता। चाहे उसका लक्ष्य प्रशस्त हो या अप्रशस्त, वह निरन्तर चिन्ताशील रहता है कि “वह दिन कब मिलेगा, जब मुझे अपनी साधमें पूर्ण सफलता मिलेगी ।” कविवर द्यानतरायके जीवनकी भी एक साथ है; परन्तु वह बड़ी अद्भुत और अलौकिक है। उनकी साथ संसारके किसी भी उच्चतम ऐश्वर्य एवं समृद्धिके उपभोगकी नहीं है। उनकी एकमात्र आकांक्षा है–संसारके समस्त वैभाविक विकल्पोंको दूरकर विशुद्ध आत्मस्थ हो जाने की। वह निरन्तर केवल शुद्ध-बुद्ध, अखण्ड सच्चिदानन्दमय आत्मानुभूति की पावन धाराम ही निमग्न रहना चाहते हैं। ससमें आत्मा एवं परमात्मा जैसे विकल्पोंको भी वह किंचित् भी स्थान नहीं देना चाहते । आइए, तनिक द्यानतरायजीकी साधको उन्हींकी वाणीमें सुनें । वह कहते हैं:-“मोहि कब ऐसो दिन आयहं । सकल विभाव अभाव होंहिंगे, विकलपता मिट जायहै।” मोहि कब ऐसा दिन आयहै ।।” भगवन् ! मुझे वह सुयोग्य कब प्राप्त होगा, जब मेरी आत्माकी समस्त वभाविक परणतियाँ और विकल्प सब प्रकारसे निर्मूल हो जावेंगे

तथा आत्माकी शुद्ध स्वाभाविक एवं निराकुल अवस्था प्रकट हो जायगी। भगवन् ! मुझे वह सुयोग कब प्राप्त होगा ? जब तक आत्मामें राग और द्वेष विद्यमान रहते हैं उसकी वैभाविक परणति विभाव रूपसे परिणमन करती है, परन्तु ज्योंही इसके विभाव रूपसे परिणमत कराने के हेतु निर्मूल हो जाते हैं, आत्मा अपनी विशुद्ध स्वाभाविक ज्योतिसे आलोकित हो उठती है। उस समय आत्मामें जिस प्रकारकी अडिग एवं अकम्प अनुभूति उदित होती है, कविवर उसी आत्मा-नुभूतिका अलख जगा रहे हैं। देखिए, वह अपनी साधमें कहाँ तक उड़ान भर चुके हैं-

“यह परमातम, यह मम आतम, भेद-बुद्धि न रहायहैं।

विशुद्ध आत्मानुभूतिकी स्थितिमें “यह परमात्मा है और यह मेरी आत्मा है” इस प्रकारकी कोई भी भेद-बुद्धि शेष नहीं रह जाती है। और वस्तुओंकी कौन चर्चा करे, यहां तक कि उस समय आत्म-परका विवेक करनेवाला भेद-विज्ञान भी अपनी उपयोगात्मक अवस्थामें नहीं रहता । भगवन् ! मुझे ऐसा सुयोग कब प्राप्त होगा ? शुद्धात्मानुभूतिकी चरम कक्षामें ध्यान, ध्याता, व्ययका किंचित् भी विकल्प शेष नहीं रह जाता है। कर्ता, कर्म, क्रियाकी पृथक् पृथक् तनिक भी अनुभूति नहीं होती। उस समय चैतन्य-ईश्वर कर्ताका चैतन्य भाव ही कर्म होता है और चेतना ही क्रिया होती है। तीनोंका ही एक इस प्रकारका अभिन्न एवं अखण्ड तादात्म्य होता है, जिसका विवेचन वाणी द्वारा नहीं किया जा सकता। कविवर ‘द्यानतराय’ इसी प्रकारकी अद्भुत आत्मानुभूतिके लिए उत्कंठित दिखलाई दे रहे हैं। देखिए, वह अपनी अखंड आत्मानुभूतिके समय किस प्रकार आत्म-सम्बन्धी विकल्प को भी तनिक भी स्थान नहीं दे रहे हैं:-

“जानें आप आप में आपा, सो व्यवहार विलायहै ।

विशुद्ध आत्मानुभूतिके समय यह व्यवहार तक विलीन हो जाता है कि आत्मा, अपने में अपनको जानता है। यहां तक कि उस समय नय-प्रमाण और निक्षेप सम्बन्धी विकल्पोंके लिए भी किञ्चित् भी अवसर नहीं रह जाता है।

भगवन् ! मुझे ऐसा सुयोग कब प्राप्त होगा ?

अखण्ड आत्मानुभूतिकी वेलामें शुद्धात्म-स्वरूपका व्याख्यान करने-वाले सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक् चारित्रके विकल्प भी शेष नहीं रहते हैं। उस समय एकमात्र जिस अखण्ड-चैतन्य ज्योतिका प्रकाश देदीप्य-मान रहता है, कविवर केवल उसी चतन्य ज्योतिकी अनुभूतिमें सदाके लिए निमग्न रहना चाहते हैं। देखिए, कविन अपनी अभिलाषाकी तीव्रता कितनी स्पष्ट पदावलीमें प्रस्तुत की हैः

“दरसन ज्ञान चरनके विकलप, कहो कहाँ ठहराय है।

विशुद्ध आत्मानुभूतिके क्षणोंमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक् चारित्र जैसे आत्म-विकल्प भी शेष नहीं रह जाते हैं। उस समय तो चैतन्य अपनी विशुद्ध चैतन्य अवस्थामें विद्यमान रहता है और पुद्गल अपने विशुद्ध पौगलिक स्वरूपमें ।

भगवन् ! मुझे कब इस प्रकारका सुयोग प्राप्त होगा ?

मानवके सम्पूर्ण त्रासका आधार उसकी अपनी भूलभरी बहिर्मुख प्रवृत्ति है। अपनेको सुखी बनानेके लिए उसे कविवर ‘द्यानतराय’ जैसी ही शुद्धात्मानुभूतिकी साध सामने रखकर ही अग्रसर होना चाहिए इसीमें उसका कल्याण है ।

मानवका जीवनाकाश जब संकटकी घन-घटाओंसे श्रच्छन्न हो जाता है तब वह कर्तव्य-विमूढ़ होकर भगवान्‌की शरणमें जाता है। उसे इस बातकी दृढ़ श्रद्धा रहती है कि भगवान्‌की सातिशय शरण उसे निश्चय ही संकट-मुक्त कर देगी। उसकी सुदृढ़ श्रद्धाके आधारबिन्दु होते हैं वे पौराणिक भक्तजन जो घोरातिघोर संकटमें पड़कर अनन्त शक्तिशाली भगवान्‌की शरणमें पहुँचे और समीचीन भक्तिके कारण घोरतम संकटों से मुक्त हो गये । कविवर ‘द्यानतराय’ भी इस पदम बड़े संकटग्रस्त दिखलाई दे रहे हैं। वह अनेकानेक पौराणिक महापुरुषोंके उद्धारका उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और भगवान्से निवेदन करते हैं कि भगवन् ! में एक भयंकर संकटमें पड़ा हुआ हूँ। मुझे शीघ्र ही इस संकटसे वचाइए । मेरी बार क्यों देर कर रहे हैं।" यह बात स्मरणीय है कि द्यानतरायजीका संकट साधारण लौकिक संकट नहीं है। अपनी अवैराग्यपूर्ण दशा ही उन्हें भयंकर संकट दिखलाई दे रही है और इस संकटसे मुक्त होने के लिए ही वह भगवान् की पवित्र शरणमें विनम्र प्रार्थी हैं। द्यानतरायजी पहले सुदर्शन सेठको संकटसे मुक्त करनेका आख्यान भगवान्‌के सामने रखते हैं और देखिए, किस प्रकार स्वयंके संकटको यथा-शीघ्र दूर करनेकी भगवान्से प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं:-

स्रोत: अध्यात्म पदावली।

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