मोही जीव भरमतमतैं नहिं, वस्तुस्वरूप लखै है जैसैं | Mohi Jiv Bharamatamatain Nahin Vastusvarup Lakhai Hai Jaisain

मोही जीव भरमतमतैं नहिं, वस्तुस्वरूप लखै है जैसैं

मोही जीव भरमतमतैं नहिं, वस्तुस्वरूप लखै है जैसैं ।।टेक।।

जे जे जड़ चेतन की परनति, ते अनिवार परनवै वैसै ।
वृथा दुखी शठ कर विकलप यौं, नहिं परिनवैं परिनवैं ऐसैं ।।१।।

अशुचि सरोग समल जड़मूरत, लखत विलात गगनघन जैसैं ।
सो तन ताहि निहार अपनपो, चहत अबाध रहै थिर कैसैं ।।२।।

सुत-पित-बंधु-वियोगयोग यौं, ज्यौं सराय जन निकसै पैसैं ।
विलखत हरखत शठ अपने लखि, रोवत हँसत मत्तजन जैसैं ।।३।।

जिन-रवि-वैन किरन लहि जिन निज, रूप सुभिन्न कियौ परमैसैं ।
सो जगमौल ‘दौल’ को चिर-थित, मोहविलास निकास हृदैसैं ।।४।।

अनिवार = जो टले नहीं । पैसे = प्रवेश करना ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १५० से १५१

अर्थ

मोही जीव, मोहग्रस्त जीव भ्रमरूपी अंधकार के कारण वस्तु-स्वरूप जैसा है उसे वैसा नहीं देखकर अन्यथा देखता है, अंशरूप देखता है।

जे जे जड़ चेतन की परनति, ते अनिवार परनवै वैसै।

पुद्गल का व जीव का परिणमन एक निश्चित रूप में होता है, उनके परिणमन के सम्बन्ध में, उनके संबंध में यह अल्पज्ञानी विकल्प करता रहता है कि इनका परिणमन इस प्रकार न होकर अन्य प्रकार से हो जाये।

अशुचि सरोग समल जड़मूरत, लखत विलात गगनघन जैसें।

यह देह अशुचि अपवित्र है, रोगसहित है, मलसहित है, मूर्त-जड़रूप है और आकाश में बादलों के विलीन होने के समान यह देह भी देखते-देखते विलीन हो जाती है, ओझल हो जाती है। तू इस देह से अपनापन जोड़ता है, देखता है और चाहता है कि यह सब बाधारहित होकर जैसा है वैसा का वैसा ही स्थिर रहे, यह कैसे संभव है ?

सुत-पित-बंधु-वियोगयोग यौं, ज्यौं सराय जन निकसै पैसैं।

जैसे सराय में यात्री आते हैं और जाते हैं, वैसे ही पुत्र, स्त्री और भाई बंधुओं से भी संयोग और वियोग होता रहता है अर्थात् परिवार में कोई नया सम्बन्धी आता है तो कोई पुराना सम्बन्धी बिछुड़ जाता है, मर जाता है। जिसको देखकर

अपनत्व के कारण, मोहवश, नशेबाज की भाँति उन्मत्त होकर प्राणी कभी रोता है तो कभी प्रसन्न होता है। जिनेन्द्र के उपदेशरूपी किरण से अपने को पर से भिन्न पहचान ! हे जगत शिरोमणि ! हृदय से मोह की ऐसी दिलासिता की दूर कर। दौलतराम भी ऐसा ही चाहते हैं कि उनका चित्त स्थिर हो।

शब्दार्थ: अनिवार - जो टले नहीं। पैसे - प्रवेश करना।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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