मोह दुःखमय दुख का कारण कहा | moha duhkhamaya dukha ka karana kaha

तर्जः आत्मा हूँ, आत्मा हूँ, आत्मा…

मोह दुःखमय दुख का कारण कहा।
आत्मा ही सदा सुखमय है अहा॥ टेक ॥
भूल आतम को अरे भ्रमता रहा,
बीज दुःख के ही सदा बोता रहा।
अब निहारो आत्मा अपना अहा ॥ 1 ॥

मलिन हैं सेवाल सम आश्रव सभी,
हो सकें नहीं सुख के कारण कभी।
शुद्ध चिन्मय आत्मा ही है सदा ॥ 2 ॥

छोड़ आश्रय अब अरे पर भाव का,
अनुभवन कर सहज पंचम भाव का।
सिद्ध सम पंचम गति पावे अहा ॥ 3 ॥

जग प्रपंचों से रहित मुनिवर अहो,
पंचाचारों से सुशोभित साधु जो ।
सतत् आराधें ध्रुवातम ही अहा॥ 4 ॥

छोड़कर कर्तृत्त्व मिथ्या सब अरे,
मति व्यवस्थित कर सहज ज्ञाता रहो।
निर्विकल्प आनंदमय रहता अहा ॥ 5 ॥

जिनागम का सार, मुक्तिमार्ग यह,
है परम सत्यार्थ अरु परमार्थ यह।
यह समय का सार मंगलमय अहा ॥ 6 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’