मितवा रे सुमिरण अवसर आयो..
मितवा रे सुमिरण अवसर आयो… २,
म्हारा जीवड़ारो…म्हरो ज्ञानारो
म्हारा चेतन को चमको तारो म्हारा वीर प्रभुजी।।टेक।।
साधर्मी सब मिल जिनमंदिर में चालों…२
मैं सचमुच…मैं सबकुछ…मैं निज वैभव को पाया..।।१।।
मितवा रे मंगल उत्सव आयो…२
देव-देवी ने…इन्द्राणी.. नर-नारी ने प्रवचनसार भायो।।२।।
साधर्मी सम्मेदशिखर को चाल्यो…२
म्हारा कुन्दकुन्द, म्हारा कहान गुरु, म्हारा चेतन को।
चमको तारो…महावीर प्रभुजी।।३।।
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मितवा रे सुवरण अवसर आयो।
म्हारो जीवड़ारो, म्हारो ज्ञानारो
म्हारो चेतन रो, चमक्यो तारो।
म्हारा मीत भला सा ॥ टेक ॥
साधर्मी रे! जिन मंदिर में चाला।
मैं सब कुछ-मैं सब कुछ;
मैं निज वैभव को पाया।
म्हारा मीत भला सा ।।
मितवा रे! पञ्चकल्याणक आया।
देव-देवी ने, इन्द्राणी ने;
नर-नारी ने मङ्गल गायो।
म्हारा मीत भला सा ।।
साधर्मी रे! जिनशासन है प्यारा।
दस धर्माणों, छह द्रव्याणों,
सात तत्त्वानु वर्णन सारो
म्हारा मीत भला सा ।।
Lyrics : Chandra Prabha Jain, Ujjain