मिलता है जिनधरम | Milta Hai Jindharam

तर्ज : खिलते हैं गुल यहाँ

मिलता है जिनधरम, भाग्य के जगने से,
मिलता है जिनधरम, भाग्य के जगने से ।
मिलता है जिनधरम ।। टेक ।।

नरकों में ना मिला, ना मिला देव में,
भव-भव में फिरा, कुगुरु कुदेव में ।
भाग्य जिनका जग गया, पा गए वो धर्म ये,
मिलता है जिनधरम, भाग्य के जगने से ।। 1 ।।
मिलता है जिनधरम …

राग व द्वेष में, विषयों के देश में,
ठग रहे थे मुझे, कुगुरु के वेश में ।
आज मिले सद्‌गुरु, मोक्ष मार्ग अब शुरू,
मिलता है जिनधरम, भाग्य के जगने से ।। 2 ।।
मिलता है जिनधरम …

पाया है नर जनम, अब मिला जिन धरम,
देव गुरु मिल गए, मिल गया ज्ञान धन ।
अब धनिक मैं हो गया, दूर हुए सारे गम,
मिलता है जिनधरम, भाग्य के जगने से ।। 3 ।।
मिलता है जिनधरम …

मैं ही स्वयं प्रभु, ज्ञान मुझे हुआ,
दूर हुई व्यथा, शिवपद पा गया ।
ना रहूँगा अब कहीं, सच्चा घर है मिल गया,
मिलता है जिनधरम, भाग्य के जगने से ।। 4 ।।
मिलता है जिनधरम …


स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन