म्हें तो थाकी आज महिमा जानी, अब लों नहिं उर आनी | Mhen To Thaki Aj Mahima Jani Ab Lon Nahin Ur Ani

म्हें तो थाकी आज महिमा जानी, अब लों नहिं उर आनी

म्हें तो थाकी आज महिमा जानी, अब लों नहिं उर आनी ।।टेक।।

काहे को भव वनमें भ्रमते, क्यों होते दुखदानी ।।१।। म्हें तो. ।।

नाम-प्रताप तिरे अंजनसे, कीचकसे अभिमानी ।।२।। म्हें तो. ।।

ऐसी साख बहुत सुनियत है, जैनपुराण बखानी ।।३।। म्हें तो. ।।

‘भूधर’ को सेवा वर दीजै, मैं जाचक तुम दानी ।।४।। म्हें तो. ।।


Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ४६

अर्थ

हे भगवन ! हमने आज आपकी महिमा (विशेषता, विरुदावली) जानी, अब तक ये बात (महिमा) हमारे हृदय में नही आई थी। यदि आपकी महिमा/ विशेषता/गुणों को पहले जान लेते तो हम क्यों अब तक भव-भ्रमण करते? क्यों संसार में रुलते और क्यों दुःखी होते? आपके नाम स्मरण से अंजन चोर व कीचक जैसे अभिमानी भी तिर गए। आपकी ऐसी साख जैन पुराणों में बहुत वर्णित है, बहुत कही गई है, वह हमने भी बहुत सुनी है। भूधरदास कहते हैं कि मैं याचक हूँ और आप हैं दानी अतः मुझको आपकी सेवा करने का वर/ अवसर दीजिए।

स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 36।

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