तर्ज : मनड़ो म्हारो लाग्यो प्रभु भक्ति में …
म्हारो मन लागो जिन भक्ति में।
जिन भक्ति में, जिन भक्ति में ।। टेक ।।
प्रभु की शान्त छवि निरखत ही,
उपज्यो
पर मानन्द ।
उपज्यो परमानन्द जिनेश्वर,
मिटे सकल जग द्वन्द्व ।। 1।।
जग अशरण निस्सार दिखावे,
चाह न रही लगार।
शिवपथ में बढ़ता ही जाऊँ,
यही भाव अविकार ।। 2।।
कर्त्तापन तो मिथ्या भासे,
वर्तुँ
जाननहार
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निजानन्द में तृप्त रहूँ,
निज प्रभुता लहूँ अपार ।। 3।।
पुण्योदय की सकल विभूति,
दीखे नाथ
अभोग्य ।
उदासीन हो निज पद ध्याऊँ,
मिटे जनम का रोग।। 4।।
प्रभु चरणों में बलि-बलि जाऊँ,
पाया मुक्ति
पंथ ।
प्रभु से गुण परिणति में प्रगटें,
अहो ! अहो !! भगवन्त।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ८२ से ८३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’