मेरी परिणति में चार-चार भूल | meri parinati mem chara chara bhula

मेरी परिणति में चार-चार भूल।

निश्चय किया आज छोडूंगा भूल ।। टेक ।।

पहली भूल पर को निज माना, श्रद्धा में आया न मूल।
आत्मप्रभु को देखे बिना मैं, पाया नहीं भव कूल।। 1।।

दूजी भूल पर का कर्त्ता माने, नहिं आतम अकर्त्ता कबूल ।
अजर-अमर अविनाशी आत्मा से तो रहा प्रतिकूल ।। 2।।

तीजी भूल शुभ भावों में मानता, शुभ भाव लगें अनुकूल।
आस्रव की जाति के ही ये तो भाई, इनमें मिलेंगे भव शूल ।। 3 ।।

चौथी भूल प्राप्त पर्याय में तन्मय, द्रव्यदृष्टि रही दूर।
ध्रुव स्वभाव जाना न अभी तक,कैसे खिले सुख फूल।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८० से ३८१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’