मेरी परिणति में भगवान्, प्रकट हो जावे आतम ज्ञान
मेरी परिणति में भगवान्, प्रकट हो जावे आतम ज्ञान ।।टेक।।
मम स्वरूप अत्यन्त मनोहर, ध्रुव अखण्ड आनंद सरोवर ।
निशदिन रहे उसी का ध्यान ।।प्रकट.।। 1 ।।
कर आराधन निज स्वभाव का, भय मे तूँ दु:खाय विभाव का ।
कर लूँ निज-पर का कल्याण ।।प्रकट.।। 2 ।।
जिसने निज आतम आराधा, दूर हुई सब उसकी बाधा ।
प्रगटा उसके मोक्ष महान् ।।प्रकट.।। 3 ।।
प्रभुवर तुम अति ही उपकारी, दिखलाते शिव पथ अविकारी ।
करते अत: आप गुणगान ।।प्रकट.।। 4 ।।
द्रव्य दृष्टि से तुम समान हूँ, मात्र परिणति मोहवान है ।
होवे परिणति आप समान ।।प्रकट.।। 5 ।।
जब तक नहिं शुद्धोपयोग हो, तब तक तब भक्ति मनोग हो ।
करूँ मैं ज्ञान-ध्यान आत्मज्ञान ।।प्रकट.।। 6 ।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८६