मेरे मन कब ह्वै है बैराग | Mere Man Kab Hvai Hai Bairag

मेरे मन कब ह्वै है बैराग

मेरे मन कब ह्वै है बैराग

राज समाज अकाज विचारौं, छारौं विषय कारे नाग॥मेरे. ॥१॥

मन्दिर वास उदास होयकैं, जाय बसौं बन बाग॥मेरे. ॥२॥

कब यह आसा कांसा फूटै, लोभ भाव जाय भाग॥मेरे.॥३॥

आप समान सबै जिय जानौं, राग दोषकों त्याग॥मेरे.॥४ ॥

‘द्यानत’ यह विधि जब बनि आवै, सोई घड़ी बड़भाग ॥मेरे. ॥५॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ११२

अर्थ

मेरे मन में कब विरक्तता होकर वैराग्य की भावना होगी? राजकार्य, सामाजिक कार्य इन सबको निरर्थक जानकर इन्द्रिय विषयरूप काले नागों से कब छुटकारा होगा अर्थात् विषयों का त्याग होगा !

मन्दिर व घर से उदासीन होकर बन में, बगीचे में जाकर प्रकृति की गोद में कब निवास करूँगा?

कब आशा का पात्र नष्ट हो और हृदय से लोभ भी निकल जाए अर्थात् कामनाएँ - तृष्णा समाप्त हो !

कब ऐसा होगा कि सभी जीवों को अपने समान जानूँ ! उनसे सभी प्रकार का राग-द्वेष का भाव त्यागूँ !

द्यानतराय कहते हैं कि जब इस प्रकार सब घटनाएँ घटित हों वह घड़ी ही अत्यन्त भाग्यशाली होगी।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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