तर्ज : मेरे घर आई एक नन्ही परी
मेरे मन भाई - मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि - तेरी दिव्य छवि,
वीतरागी है झलके शांति अपार - मेरे मन भाई ।। टेक ।।
मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि …
दर पे आने से शांति मिलती है, नैनों से करुणाधार झलती है,
हे प्रभु आपकी निकटता से, मुझे मिलती है ज्ञान की ही फुहार ।
मेरे मन भाई - मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि - तेरी दिव्य छवि ।। १ ।।
मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि …
जब से माना तुम्हें प्रभु अपना, जग लगता है मुझे अब निस्सार,
हर जगह बन्ध हैं कर्मों के, आप में दिखता मुझे मुक्ति द्वार ।
मेरे मन भाई - मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि - तेरी दिव्य छवि ।। २ ।।
मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि …
जिनके सर्वांग से खिरी वाणी, और झरती है जैसे जिनवाणी,
देख प्रभुवर को मन नहीं भरता, चाहे निरखूँ प्रभु अनन्तों बार ।
मेरे मन भाई - मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि - तेरी दिव्य छवि ।। ३ ।।
मेरे मन भाई तेरी दिव्य छवि …
༄༅༅༅༅༅ॐ༅༅༅༅༅༄
श्रद्धेय बाबूजी की कलम से…!
गन्दी रही आदत, की पटाये से जान-पहचान,
उभी पट समर्पित रहे, उसी का सम्मान ।
पटाये से मिलेगा क्या, अटे ओ अकल के दुश्मन,
एक बार केवल अपनी, गरिमा को पहचान ।।
स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन