मेरे लागी है लगन, छूटत नाँहि, छूटत नाँहि ।। टेक ।।
मेरे मन में ऐसी आवे, जिनवाणी अभ्यास करावे।
सप्त तत्त्व का निर्णय होवे, सम्यग्दर्शन सूर्य उगावे ।। 1।।
मेरो मन जिन भक्ति रचावे, जिन में भी निज दर्शन पावे ।
जिन जैसा फिर निज को ध्यावे, साहब सेवक भेद मिटावे ।। 2 ।।
मुनिदीक्षा को हिय हुलसावे, धन्य दशा वह अब प्रगटावे ।
रागादि रहित निज में रम जाऊँ, परमातम खुद ही बन जाऊँ ।। 3 ।।
सहज अयोग दशा रह जावे, क्षण भर में शिवपुर पधरावे ।
लौट के फिर नहीं भव में आवे, सुखमय काल अनंत रहावे ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’