मेरे कब ह्वै वा दिन की सुघरी ॥ टेक ॥
तन बिन वसन असन बिन वन में, निवसों नासादृष्टि धरी ।
पुण्य पाप परसौं कब विरचौं, परचों निजनिधि चिरविसरी ।
तज उपाधि सजि सहज समाधी, सहो घाम हिम मेघझरी ॥1 ॥
कब थिरजोग धरों ऐसो मोहि, उपल जान मृग खाज हरी।
ध्यान-कमान तान अनुभव शर, छेदो किहि दिन मोह अरी ॥2॥
कब तृनकंचन एक गानों अरु, मनिजड़ि तालय शैलदरी।
‘दौलत’ सत् गुरुचरन सेव जो, पुरवो आश यहैं हमरी ॥3 ॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १७६