तर्ज : अरहंतों की जय-जय गाते चलो …
मेरे हृदय विराजो नेमीश्वर, मेरे उर में विराजो नेमीश्वर।
मेरे जीवन के आधार नेमीश्वर, मुक्तिमार्ग आदर्श नेमीश्वर ।। टेक ।।
ब्याह समय वैराग्य धरि, हुए स्वयं में लीन ।
तीर्थेश्वर पद पाइयो, पुण्य-पाप कर क्षीण।। 1।।
अहो ! अतीन्द्रिय ज्ञानमय, परमानन्द की खान।
प्रभु प्रसाद अन्तर लखो, चिदानन्द भगवान।। 2।।
आराधूँ निजनाथ को, बनूँ स्वयं जिननाथ।
यही भावना भावते, चरणन नाऊँ माथ।। 3।।
तृप्त रहूँ निज में अहो, वर्तुं जाननहार ।
सर्व विभाव विनष्ट हों, सहज लहूँ भवपार।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’