मेरे हृदय विराजो गुरुवर ॥ टेक ॥
सम्यग्ज्ञानी परम विरागी, रत्नत्रय निधि के अनुरागी।
परिणति ध्रुव स्वभाव में पागी, पर भावों के सच्चे त्यागी ॥ 1 ॥
ज्ञाता रूप सहज परमातम, अंतर में देखें शुद्धातम।
परीषहों में नहीं अकुलावें, उपसर्गों से नहीं चिगावें ॥ 2 ॥
तोड़ी जिनने ममता फाँसी, इष्ट-अनिष्ट कल्पना नाशी।
कभी न कोई जिनको भय है, जिनका जीवन समतामय है ॥ 3 ॥
उदासीन हैं सारे जग से, तृप्त सदा ही स्वयं स्वयं से।
इन्द्रादिक भी करें वंदना, तो भी हो अभिमान रंच ना ॥4॥
मैं भी भेदज्ञान नित भाऊँ, सम्यक् समता सहज ही पाऊँ।
आप रहो आदर्श हमारे, मिथ्या भाव नशावन हारे ॥ 5॥
भक्ति सहित चरणों शिर नाऊँ, कब निर्ग्रन्थ दशा प्रगटाऊँ ।
निर्वाछंक हो मैं भी चाहूँ, सम्यक् बोधि समाधि पाऊँ ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’