मेरे गुरु निर्ग्रन्थ वीतराग होई | Mere Guru Nirgranth Vitarag Hoi

तर्ज- मेरे प्रभु वीतराग…

मेरे गुरु निर्ग्रन्थ वीतराग होई ।

साँचे गुरु निर्ग्रन्थ वीतराग होई । ।टेक ।।

हिंसादिक पापों के सर्वदेश त्यागी,
देह मात्र परिग्रह से भी विरागी।
निरपेक्ष निर्द्वन्द निरामय होई ।। साँचे ।।। ।।
निरावरण निर्विकार यथाजात काया,
पीछी कमण्डल ही साथ सुहाया।
धीर वीर जितेन्द्रिय निष्काम होई । ।साँचे. । ।2।।
मुनिवर हैं निस्वार्थ, सबके उपकारी,
रत्नत्रय रूप भाव सदा अविकारी।
ज्ञान ध्यान तपलीन परमसुखी होई । ।साँचे. ।। 3 ।।

ऐसे वनवासी साधु कर्मबन्ध टारौं,
आप तिरैं औरन को सहजपने तारें।
हो नमोस्तु मेरी दशा ऐसी कब होई ।। साँचे. । ।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २०१