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मेरा मनवा कभी तो डोले जल में, कभी ये भागे थल में,
गली ना भगवान् की, हे गली ना आतम राम की,
कैसे रोकूँ गति मन बेईमान की।
मैंने कहा चल पूजन कर ले, ये बम्बई को चला गया।
ऐसा गया बिन ईंधन और पानी की, रॉकेट को पीछे छोड़ गया॥
तो मैंने माला लेकर टेरा, ये पहुँचा पनघट पे,
बड़ा रे सैलानी, ना माने अभिमानी, बात कल्याण की,
कैसे रोकूँ गति मन बेईमान की।
।।1।।
लाख कहो एक ठौर रुके ना, ऐसा है ये आवारा।
जाने कितनी राहें समेटे, फिरता ये मन का बंजारा॥
जितनी लहरें इस मन में हैं, अरे क्या होंगी सागर में।
कभी ये करे घर की, कभी खलिहान की, पल में लाए ये खबर जापान की॥
।।2।।
ऋषि-मुनि तक रोक ना पाए, कौन इसे समझाएगा।
मृग जैसी छल्लांगों भरे मन, हाथ में कैसे आएगा॥
सचमुच वे हैं वंदनी, जिनने इस मन को मारा।
पथिक इसे रोको, कि पल-पल टोको, कमान ये ध्यान की,
फिर रुके गति मन बेईमान की।
।।3।।
रचयिता : पण्डित विनय कुमार जी ‘पथिक’, मथुरा चौरासी (उत्तर प्रदेश)
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस
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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।