तर्जः मनवा म्हारो लाग्यो…
मेरा मन उमगे प्रभु दर्शन को, दर्शन को, स्पर्शन को ।। टेक ।।
प्रभु की मूरति मंगलकारी, मोह महातम नाशनहारी।
सम्यक् ज्ञान कला सिखलाती, अनुपम ज्ञायक रूप दिखाती ।। 1 ।।
जग में कोई शरण न पाया, भरमाया था अति अकुलाया।
प्रभु को पा मन शांत हुआ है, सहज रूप संतुष्ट हुआ है ।। 2 ।।
भव-भव का सब क्लेश नशाया, मुक्तिमार्ग जिनवर से पाया।
विषय सुखों की चाह नहीं है, कर्मों की परवाह नहीं है ।। 3 ।।
जिनवर अहो परम उपकारी, भाव वंदना हो अविकारी।
तुम समान समवृत्ति धारी, होऊँ मैं चैतन्य विहारी।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’