मेरा ज्ञायक प्रभु मंगलमय | mera jjayaka prabhu mamgalamaya

मेरा ज्ञायक प्रभु मंगलमय

मेरा ज्ञायक प्रभु मंगलमय,
सुख दाता भंजन सब दु:खभय ।।टेक।।

परम ज्योति कारण परमातम,
तुम अनुभव हरता मिथ्यातम ।
अचल अनुपम ध्रुव निरपेक्षा,
एक रूप नहीं पर सापेक्षा ।।1।।

परिणतियाँ तो नित्य बदलती,
उनका लक्ष्य सदा दु:ख दाता ।
स्व परिवर्तन रहित ज्ञानमय,
निज में लीन हुआ सुख पाता ।।2।।

ज्ञायक दर्शन ही सद्दर्शन,
ज्ञायक ज्ञान ही सम्यक् ज्ञाना ।
ज्ञायक ही में जो थिर होवे,
वह ही सम्यक् चारित्र वाना ।।3।।

हे प्रभु मैंने अब यह जाना,
ज्ञायक भाव मोक्ष का कारण ।
जिनने ज्ञायक को अपनाया,
उनके भव का हुआ निवारण ।।4।।

अब तो दृढ़ निश्चय है मुझको,
मेरा ज्ञायक उपादेय है ।
ज्ञायक ही जग में अवलम्बन,
शेष सभी कुछ मात्र हेय हैं ।।5।।

यही भावना है अब मेरी,
परिणति ज्ञायक में थिर होवे ।
ज्ञायक की अनुभूति का रस,
काल अनन्त प्रवाहित होवे ।।6।।


स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ १०४ से १०५