मत राचो धीधारी, भव रंभथंभसम जानके | Mat Racho Dhidhari Bhav Ranbhathanbhasam Janake

मत राचो धीधारी, भव रंभथंभसम जानके

मत राचो धीधारी, भव रंभथंभसम जानके ।।टेक।।

इन्द्रजालको ख्याल मोह ठग, विभ्रमपास पसारी ।
चहुंगति विपतिमयी जामें जन भ्रमत भरत दुख भारी ।।१।। मत. ।।

रामा मा, मा वामा, सुत पितु, सुता श्वसा, अवतारी ।
को अचंभ जहां आप आपके, पुत्र दशा विसतारी ।।२।। मत. ।।

घोर नरक दुख ओर न छोर न, लेश न सुख विस्तारी ।
सुरनर प्रचुर विषयजुर जारे, को सुखिया संसारी ।।३।। मत. ।।

मंडल है आखंडल छिन में, नृप कृमि सधन भिखारी ।
जा सुत विरह मरी ह्वै वाघिनि, ता सुत देह विदारी ।।४।। मत. ।।

शिशु न हिताहितज्ञान तरुण उर, मदनदहन पर जारी ।
वृद्ध भये विकलांगी थाये, कौन दशा सुखकारी ।।५।। मत. ।।

यौं असार लख छार भव्य झट, भये मोखमगचारी ।
यातैं होउ उदास ‘दौल’ अब, भज जिनपति जगतारी ।।६।। मत. ।।

रंभ-थंभ = केले का थंभा/तना; धी = बुद्धि, वामा - स्त्री; श्वसा = बहिन; मंडल = कुत्ता;
आखंडल = इन्द्र, देव ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १३५ से १३६

अर्थ

हे बुद्धिमान ! इस जीवन को केले के थंभ (स्तंभ) के समान निःसार व नश्वर जानकर इसमें अनुरक्त मत होओ।

इस मोहरूपी ठग ने इन्द्रजाल की भाँति विभ्रम का जाल चारों ओर फैला रखा है जिसमें चारों गतियाँ अति दुःख से भरी हुई हैं और यह जीव इसमें भटक रहा है, भारी दुःख उठा रहा है।

रामा मा, मा वामा, सुत पितु, सुता श्वसा, अवत्तारी।

उस भवरूपी नदी में कभी माता, कभी स्त्री, कभी पुत्र, कभी पिता, कभी बेटी, कभी बहन होकर जन्मे हैं, वहाँ क्या आश्चर्य है कि अपने ही कुटुम्ब/ पुत्र - संतति का विस्तार हुआ है (अर्थात् अपने ही परिवार में पुनः जन्म ले लिया हो)।

जहाँ नरक के-से दुःखों का कहीं अन्त नहीं दिखाई देता, जिसमें तनिक भी सुख नहीं है - ऐसे विषम ज्वर के ताप में जल रहे कौन से संसारीजन सुखी हैं? जहाँ क्षणमात्र में कुत्ता देव हो जाता है, राजा कीड़ा हो जाता है, धनवान भिखारी हो जाता है! जहाँ अपने पुत्र के विरह में मरकर पुनः बाघिनी के रूप में जन्म लेकर अपने ही पुत्र की देह का विदारण करती है। बचपन में अपने हित/अहित का ज्ञान नहीं होता। यौवन काल में काम-वासना में जलता है और वृद्ध होने पर अंग शिथिल होकर विकलांग हो जाता है, इसमें कौनसी दशा सुखकारी है? ऐसे इस संसार की असारता को देखकर हे भव्य ! तू अविलंब मोक्षमार्ग का अनुगमन कर। दौलतराम कहते हैं कि इस संसार से विरक्त-उदास होकर अब जिनेन्द्रदेव के गुणों का चिंतवन कर, भजन कर।

शब्दार्थ: रंभ-यंभ = केले का धंभा/तना; धी = बुद्धि, वामा - स्त्री; श्वसा = बहिन; मंडल = कुत्ता; आखंडल = इन्द्र, देव ।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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