मत कीज्यौ जी यारी, ये भोग भुजंग सम जानके | Mat Kijyau Ji Yari Ye Bhog Bhujang Sam Janake

मत कीज्यौ जी यारी, ये भोग भुजंग सम जानके

मत कीज्यौ जी यारी, ये भोग भुजंग सम जानके ।।टेक।।

भुजग डसत इकबार नसत है, ये अनंत मृतुकारी ।
तिसना तृषा बढै इन सेयें, ज्यौं पीये जल खारी ।।१।।मत. ।।

रोग वियोग शोक वनको धन, समता-लताकुठारी ।
केहरी करी अरी न देत ज्यौं, त्यौं ये दैं दुखभारी ।।२।।मत. ।।

इनमें रचे देव तरु थाये, पाये श्वभ्र मुरारी ।
जे विरचे ते सुरपति अरचे, परचे सुख अधिकारी ।।३।।मत. ।।

पराधीन छिनमाहिं छीन है, पापवंधकरतारी ।
इन्हैं गिनैं सुख आकमाहिं तिन, आमतनी बुधि धारी ।।४।।मत. ।।

मीन मतंग पतंग भ्रंग मृग, इन वश भये दुखारी ।
सेवत ज्यौं किंपाक ललित, परिपाक समय दुखकारी ।।५।।मत. ।।

सुरपति नरपति खगपतिहू की, भोग न आस निवारी ।
‘दौल’ त्याग अब भज विराग सुख, ज्यौं पावै शिवनारी ।।६।।मत. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १३३ से १३४

अर्थ

अर्थ- हे भाइयो ! भोगों से प्रेम मत करो, अपितु इन्हें सर्प के समान समझो । अरे, सर्प के डसने से तो एक ही बार मृत्यु होती है, किन्तु भोग तो अनन्त बार मृत्यु करानेवाले हैं। जिस प्रकार खारा पानी पीने से प्यास बुझती नहीं, अपितु बढ़ती ही है, उसी प्रकार भोगों का सेवन करने से तृष्णा की प्यास बढ़ती ही जाती है। हे भाइयो ! ये भोग रोग, वियोग, शोकादि के वन के लिए तो बादल के समान हैं, किन्तु समतारूपी बेल के लिए कुठार के समान हैं। ये भोग इतना भारी दुःख देते हैं कि हाथी का शत्रु सिंह भी उतना दुःख नहीं दे सकता है। स्वर्ग के देव भी इन भोगों में लिप्त रहने के कारण वनस्पति बन जाते हैं। मुरारी को भी इन्हीं भोगों के कारण नरक की प्राप्ति हुई थी। जो जीव इन भोगों से विरक्त हो जाते हैं, उनकी इन्द्र भी पूजा करते है। सच्चे सुख से परिचित होने का अधिकार भी उन्हीं जीवों को है। ये भोग पराधीन हैं, क्षणभंगुर हैं और पापबन्ध के कारण हैं। जो जीच इनमें सुख समझते हैं, वे आक को ही आम समझते हैं। मछली, हाथी, पतंगा, भौंरा और हिरण-ये जीव भी इन्हीं भोगों के वशीभूत होकर महादुःखी होते हैं। ये भोग सेवन करते समय तो किंपाकफल के समान सुन्दर लगते हैं, किन्तु परिपाक के समय बहुत दुःख देनेवाले हैं। कविवर दौलतराम कहते हैं कि हे भाइयो! ये भोग इन्द्र, नरेन्द्र, खगेन्द्र की भी इच्छा पूरी नहीं कर पाते हैं; अतः अब तो इन्हें त्याग दो और वैराग्य-सुख का सेवन करो, ताकि तुम्हें मुक्ति-स्त्री की प्राप्ति हो।

शब्दार्थ: 134 दौलत-विनास

स्रोत: दौलत विलास, पद 114।

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