मत कीज्यौ जी यारी, घिनगेह देह जड़ जान के | Mat Kijyau Ji Yari Ghinageh Deh Jar A Jan Ke

मत कीज्यौ जी यारी, घिनगेह देह जड़ जान के

मत कीज्यौ जी यारी, घिनगेह देह जड़ जान के ।।टेक।।

मात-तात रज-वीरजसौं यह, उपजी मलफुलवारी ।
अस्थिमाल पलनसाजाल की, लाल लाल जलक्यारी ।।१।।मत. ।।

कर्मकुरंगथलीपुतली यह, मूत्रपुरीषभंडारी ।
चर्ममंडी रिपुकर्मघड़ी धन, धर्म चुरावन-हारी ।।२।।मत. ।।

जे जे पावन वस्तु जगत् में, ते इन सर्व निगारी ।
स्वेदमेदकफक्लेदमयी बहु, मद्गदव्यालपिटारी ।।३।।मत. ।।

जा संयोग रोगभव तौलौं, जा वियोग शिवकारी ।
बुध तासौं न ममत्व करैं यह, मूढमतिनको प्यारी ।।४।।मत. ।।

जिन पोषी ते भये सदोषी, तिन पाये दुख भारी ।
जिन तपठान ध्यानकर शोषी, तिन परनी शिवनारी ।।५।।मत. ।।

सुरधनु शरदजलद जलबुदबुद, त्यौं झट विनशनहारी ।
यातैं भिन्न जान निज चेतन, ‘दौल’ होहु शमधारी ।।६।।मत. ।।

अस्थिमाल = हाड़-हड्डियों की माल; पल-नसाजाल = मांस-नसों का समूह; पुतली = हरिणों
को फँसाने के लिए उपयोग की जानेवाली पुतली के समान; पुरीष - विष्ठा, मल; स्वेद -
पसीना; क्लेद - दुःख; शोषी = शोषण किया; सुरधनु = इन्द्रधनुष; शम = समता, शांति ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १३१ से १३२

अर्थ

हे जीव ! इस घिनौनी देह को जड़-पुद्गल जानकरके इससे मित्रता मत करो, अपनापन मत करो।

मात-तात रज-वीरजसौं यह, उपजी मलफुलवारी।

यह मैल की फुलवारी काया माता-पिता के रज और वीर्य के संयोग से उत्पन्न हुई है। यह रक्तरंजित - खून से सनी, हाड़-मांस और नसों के जल से वेष्ठित देह है।

कर्मकुरंगथलीपुतली यह, मूत्रपुरीषभंडारी ।

यह देह हरिण (जीव) को फँसाने के लिए लगे जाल (पुतली) के समान है, मल-मूत्र का भंडार/स्थान है। कर्मों को घड़नेवाली यह चमड़े से ढकी काया धर्मरूपी धन को चुरानेवाली है अर्थात् निज स्वरूप से विमुख करानेवाली है।

यह देह संसार की सभी वस्तुओं को अपवित्र करनेवाली है; पसीना, चर्बी, कफ, मवाद से भरी अभिमानरूपी विषैले सर्प की पिटारी है। इसके संयोग से भव-भ्रमणरूपी रोग पलता है और इसके वियोग से मोक्ष-सुख की प्राप्ति होती है। हे ज्ञानी, यह दह मूर्खजनों को प्यारा है, तू तो विवेकी है, तू इससे किसी प्रकार का मोह मत कर।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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