मत बिसरावो जिनजी, कि अब मैं शरण गहूँ किसकी
मत बिसरावो जिनजी, कि अब मैं शरण गहूँ किसकी ॥टेर ॥
भूल मनाये अबलो मैंने, देव तुझे बिसरा करके ।
भोगे भोग अधम तम जग के, मन अति इतरा करके॥
यह मुझको अभिमान रहा नित अमर रहूँगा आकर के।
तू सच्चा है आशा झूँठी, प्रीत करी जिसकी ॥१॥
संशय विभ्रम मोह मिटा अब, ज्ञान दीपिका जागी है।
अंतर उज्ज्वल हुये मनोरथ, विषय कालिमा भागी है।
निजानंद पद पाऊँ तुझसा लगन यही बस लागी।
सिद्धासन ‘सौभाग्य’ मिले फिर चाह करूँ किसकी ॥२॥
Artist: श्री सौभाग्यमल जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६
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