तर्ज-हृदय में विराजो श्री भगवान…
मन मंदिर में तिष्ठो, श्री मुनिराज । ।टेक ।।
काठ कमण्डल हाथ में, पीछी पंख मयूर।
परमातम पद साधते, अहो जितेन्द्रिय-शूर ।। 1 ।।
रत्नत्रयमय सम्पदा, पाई अरपरम्पार ।
निज में ही संतुष्ट हैं, परिग्रह नहीं लगार ।।2।।
निजानन्द रस भोगते, निज में तृप्त रहाय।
इन्द्रिय भोगों की नहीं, चाह हृदय उपजाय ।।3।।
घोर परिषह जीतते, अन्तर्बल प्रगटाय ।
ऐसा ही बल हो प्रगट, चरणों शीश नवाय।।4।।
अब तो बुलाओ आप ढिंग, विरह सहा नहीं जाय।
विषय चाह दावाग्नि से, गुरुवर लेहु बचाय ।। 5 ।।
ज्ञान ध्यान तप लीन गुरु, करें परम उपकार।
प्रचुर स्वसंवेदनमयी, पद पाऊँ अविकार ।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३४