तर्ज : मन डोले मेरा तन डोले
मन भाये चित हुलसाये मेरे छाया हर्ष अपार रे -
लख वीर तुम्हारी मूरतिया ।। टेक ।।
मन भाये चित हुलसाये …
देख लिया मैंने जग सारा तुमसा नजर ना आये,
वीतराग मुद्रा तुम धारे, बैठे ध्यान लगाय -
प्रभु तुम बैठे ध्यान लगाय ।
सुरपति आवे, मंगल गावे, नाचे दे दे ताल रे,
लख वीर तुम्हारी मूरतिया ।। १ ।।
मन भाये चित हुलसाये …
अष्ट कर्म को जीत प्रभु तुम पाया केवलज्ञान,
दे उपदेश बहुत जन तारे, कहाँ तक करूँ बखान -
प्रभु मैं कहाँ तक करूँ बखान ।
भय जाये, रोग ना आवे, मेरे सुधरे काम हजार रे,
लख वीर तुम्हारी मूरतिया ।। २ ।।
मन भाये चित हुलसाये …
राग द्वेष में लिप्त हुआ मैं सत को नहीं पिछाना,
पर वस्तु को अपना समझा, झूठे मत को माना -
प्रभु जी उलटे मत को माना ।
अब तुम पाए भ्रम विनशाए, भव से होंगे पार रे,
लख वीर तुम्हारी मूरतिया ।। ३ ।।
मन भाये चित हुलसाये …
༄༅༄༅༄༅༄༅༄༅
स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन