मंगलमय निजरूप महान्, मंगल परमेष्ठी भगवान्।
सिद्ध पितामह तुल्य सुजान, श्री अरहंत पिताजी मान।। 1 ।।
मंगलमय माता जिनवाणी, चाचा तुल्य साधुजन जान।
सम्यग्दृष्टि सहोदर मान, शिष्यादिक सन्तान समान।। 2।।
व्यवहारिक कुटुम्ब यह जान, निश्चय कुटुम्ब स्वयं में जान।
मंगल चैत्य-चैत्यालय जान, श्री जिनधर्म महा सुखखान ।। 3 ।।
मंगल सप्त तत्त्व पहिचान, मंगल स्व-पर भेद-विज्ञान।
मंगल निर्मल निज श्रद्धान, मंगलमय है सम्यग्ज्ञान।। 4।।
सम्यक् चारित्र सुख का धाम, निश्चय मंगल निज को मान।
निज का निज से हो कल्याण, आत्मन् निज का कर श्रद्धान।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९ से ३०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’