मंगलमय अवसर अहो, प्रभुवर मुक्त भये ।
आनंदमय मुक्त स्वरूप, प्रभुवर दिखा गये ।। टेक ।।
जयवन्ते प्रभुवर का शासन, जयवन्ते जग में जिनशासन ।
सब सुख शान्ति लहे।। 1।।
सर्व कर्म मल वर्जित आतम, ज्ञानानंदमय ध्रुव परमातम ।
सहज ही मुक्त रहे ।। 2।।
भूल स्वयं बंधन में पड़ता, समझ स्वयं को शिवपद लहता।
अन्य न कुछ भी करे।। 3।।
हरष-हरष प्रभु के गुण गावें, आत्म ज्ञान के दीप जलावें।
मोह तिमिर सु भगे।। 4।
धर्म महोत्सव मंगलकारी, मंगलकारी, सब दुखहारी।
परमानन्द
करे ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३२६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’