परमेष्ठी वाचक ओंकार को, नित योगीगण ध्याते हैं।
ऐसे काम मोक्ष दाता को, सादर शीश नवाते हैं ।। 1।।
जिस वाणी रूपी धारा ने, प्रक्षालित जग-मल को कीना।
मुनियों से उपासित सरस्वती, मम सकल पाप विध्वंस करो।। 2 ।।
अज्ञान तिमिर से अंध नेत्र, मम ज्ञानांजन की शलाका से।
जिनने खोले उन गुरुवर की, महिमा गाऊँ किन शब्दों से ।। 3 ।।
बस भक्ति पूर्वक नमस्कार कर, शरण उन्हीं की लेता हूँ।
श्री परम गुरु का अभिनन्दन, आचार्यों की थुति करता हूँ।। 4।।
पापों को दूर भगा करके, कल्याण मार्ग देने वाला।
है आत्म-धर्म से सम्बन्धित, भव्यों को बोध कराता है ।। 5।।
यह पाप प्रणाशक-पुण्य प्रकाशक, समयसार जी परमागम।
पंच-परावर्तन अभाव कर, सच्चे सुख का दाता है।। 6।।
इसके मूल कर्त्ता श्री सर्वज्ञ, तदुत्तर गणधर जी।
प्रतिगणधरादि की परम्परा से, श्री कुन्दकुन्दाचार्य जी हैं।। 7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’