माला समझ बूझ कर फेर, जासों मन तेरो फिर जाय।
मन तेरो फिर जाय, तोकूँ निज की महिमा आय ।। टेक ।।
शुद्ध-बुद्ध चैतन्यमय, शुद्धातम गुण खान ।
जाके आश्रय से बने, अहो ! सिद्ध भगवान्।। 1।।
आतम दर्शन से बने, सम्यग्दृष्टि महान् ।
अनुभव ज्ञान सु लीनता, चारित्र महिमावान।। 2।।
शुद्धातम अनुभव किये, आनंद अपरम्पार ।
जाननहार सुतृप्त हो, उछले वीर्य अपार।। 3।।
सारभूत शुद्धात्मा, केवल जाननहार ।
नित्य निरंजन देव है, समयसार अविकार।। 4।।
समयसार को नमन है, निर्विकल्प सुखकार ।
द्वैत विकल्प सु मिट गयो, सहज दशा अविकार ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९६ से ३९७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’