मैं तो सर्वज्ञ स्वरुपी हूँ
मैं अपने भावों का कर्ता, अपने वैभव का स्वामी हूँ ।
शुभ अशुभ विभाव नहीं मुझमें, निर्मल अनंत गुणधामी हूँ ।।
मैं ज्योति पुंज चित्चमत्कार, चैतन्य पूर्ण सुखरुपी हूँ ।।
मैं तो सर्वज्ञ स्वरूपी हूँ ।।१।।
मैं ज्ञानानंदी ज्ञान मात्र अविचल दर्शन बलधारी हूँ ।
मैं शाश्वत चेतन मंगलमय अविनाशी हूँ अविकारी हूँ ।।
मैं परम सत्य शिव सुन्दर हूँ, मैं एक अखंड अरूपी हूँ ।।
मैं तो सर्वज्ञ स्वरूपी हूँ ।।२।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), प्रारम्भिक भजन