मैं न जान्यो री! जीव ऐसी करैगो
मैं न जान्यो री! जीव ऐसी करैगो …
मोसौं विरति कुमतिसों रति कै, भवदुख भूरि भरैगो॥मैं. ॥१॥
स्वारथ भूलि भूलि परमारथ, विषयारथमें परैगो॥मैं.॥२॥
‘द्यानत’ जब समतासों राचै, तब सब काज सरैगो॥मैं.॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १३४
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अर्थ
हे जीव ! तू इस प्रकार का आचरण व्यवहार करेगा मैं ऐसा नहीं जानता था ! मुझसे (आत्मा से, सुमति से) इतना उदासीन होकर तू कुमति के प्रति आसक्त होगा और संसार के अनन्त दुःखों को भोगेगा, सहन करेगा ! अपना हित, अपना भला, अपना परमार्थस्वरूप भूलकर, तू इन इन्द्रिय-विषयों में रमने के लिए इतना उत्सुक होता रहेगा ! द्यानतराय कहते हैं कि जब तू समता को धारण करेगा तब ही तेरा मनोरथ पूरा होगा, कार्य सम्पन्न होगा।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 292।
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