मैं हरख्यौ निरख्यौ मुख तेरो | Main Harakhyau Nirakhyau Mukh Tero

मैं हरख्यौ निरख्यौ मुख तेरो

मैं हरख्यौ निरख्यौ मुख तेरो ।
नासान्यस्त नयन भ्रू हलय न, वचन निवारन मोह अंधेरो ।।मैं।।

परमें कर मैं निजबुधि अब लों, भवसरमें दुख सह्यौ घनेरो ।
सो दुख भानन स्वपर पिछानन, तुमविन आन न कारन हेरो ।।१।।

चाह भई शिवराहलाहकी, गयौ उछाह असंजमकेरो ।
‘दौलत’ हितविराग चित आन्यौ, जान्यौ रूप ज्ञानदृग मेरो ।।२।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २२

अर्थ

अर्थ-हे जिनेन्द्रदेव ! में आपका मुख देखकर वहुत हर्षित हुआ हूँ। हे देव ! आपके नेत्र नासिका पर टिके हुए है, आपकी भौंहें हिलती नहीं हैं और आपके वचन मोहरूपी अन्धकार को दूर करनेवाले हैं। हे जिनेन्द्रदेव! मैने आज तक पर मे निजवृद्धि करके बहुत अधिक दुःख सहन किये हैं। उन दुःखो को नष्ट करने का उपाय स्व-पर-भेदविज्ञान है और उस भेदविज्ञान के कारण एकमात्र आप हैं, आपके अतिरिक्त और कोई नहीं-यह मैं अच्छी तरह खोजकर कहता हूँ। कविवर दौलतराम कहते हैं कि हे जिनेन्द्रदेव आपके दर्शन से मुझे मोक्षमार्ग को प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत हुई है, मेरा असयम का उत्साह समाप्त हो गया है और कल्याणकारी वैराग्यभाव मेरे हृदय मे उत्पन्न हुआ है, क्योंकि मैने यह जान लिया है कि मेरा स्वरूप ती ज्ञान-दर्शन ही है।

स्रोत: दौलत विलास, पद 33।

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